Home Gali Nukkad इलेक्टोरल बॉन्ड पर फंसा पेंच | What is an Electoral Bond?

इलेक्टोरल बॉन्ड पर फंसा पेंच | What is an Electoral Bond?

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What is an Electoral Bond?

भाईसाब, इन दिनों चुनावी चंदा, चुनावी बॉन्ड, इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे शब्दों की देशभर में जबरदस्त चर्चा है, आपको जानकारी दे दें कि ये तीनों शब्द के एक ही मायने हैं, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक करार दिया, क्योंकि इससे लोगों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन होता है और इसमें देने के बदले कुछ लेने की गलत प्रक्रिया पनप सकती है, बता दें कि चुनावी चंदा देने में लेने वाला राजनीतिक दल और फंडिंग करने वाला, दो पार्टियां शामिल होती हैं, ये राजनीतिक दल को सपोर्ट करने के लिए होता है या फिर कंट्रीब्यूशन के बदले कुछ पाने की चाहत हो सकती है।

भाईसाब, चुनावी बॉन्ड एक तरह का वचन पत्र है, इसकी खरीदारी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं पर किसी भी भारतीय नागरिक या कंपनी की ओर से की जा सकती है, यह बॉन्ड नागरिक या corporate कंपनियों की ओर से अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को दान करने जरिया है, भाईसाब, आपको बताना जरूरी है कि चुनावी बॉन्ड को financial year bill 2017 के साथ पेश किया गया था, 29 जनवरी, 2018 को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनावी बॉन्ड योजना 2018 को अधिसूचित किया था,भाईसाब उसी दिन से इसकी शुरुआत हुई थी। ये जान लें चुनावी बॉन्ड हर तिमाही की शुरुआत में सरकार की ओर से 10 दिनों की अवधि के लिए बिक्री के लिए उपलब्ध कराए जाते रहे हैं, इसी बीच उनकी खरीदारी की जाती थी, सरकार की ओर से चुनावी बॉन्ड की खरीद के लिए जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के पहले 10 दिन तय किए गए हैं, भाईसाब आपको खुलासा कर दें कि इस बार लोकसभा चुनाव के वर्ष में सरकार की ओर से 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि तय किए जाने का प्लान था, चुनावी बॉन्ड की शुरुआत करते हुए सरकार ने दावा किया था इससे राजनीतिक फंडिंग के मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी, इस बॉन्ड के जरिए अपनी पसंद की पार्टी को चंदा दिया जा सकता था। अब आपको बताते हैं कि चुनावी बॉन्ड से राजनीतिक दलों को कैसे लाभ मिलता है, तो जान ले कि कोई भी भारतीय नागरिक, कॉरपोरेट और अन्य संस्थाएं चुनावी बॉन्ड खरीद सकते थे और राजनीतिक पार्टियां इस बॉन्ड को बैंक में भुनाकर रकम हासिल कर लेते थे, बैंक चुनावी बॉन्ड उसी ग्राहक को बेचते थे, जिनका kYC वेरिफाइड होता था, भाईसाब, सबसे कास बात, बॉन्ड पर चंदा देने वाले के नाम का जिक्र नहीं होता था, और हां आपको ये भी जानना बहुत जरूरी है कि चुनावी बॉन्ड में निवेश करने वाले को आधिकारिक तौर पर कोई return नहीं मिलता था, यह बॉन्ड एक रसीद के समान था, आप जिस पार्टी को चंदा देना चाहते हैं, उसके नाम से इस बॉन्ड को खरीदा जाता था और इसका पैसा संबंधित राजनीतिक दल मुहैया करा दिया जाता था। भाईसाब, इस बॉन्ड को खरीदने में एक फायदा जरूर होता था, चंदा देने से दी गई राशि पर इनकम टैक्स की धारा 80GGC और 80GGB के तहत यह छूट देने का प्रावधान है।

चलते-चलते, भाईसाब, आपको जानकारी देना जरूरी है कि 2016 और 2022 के बीच 16,437 करोड़ रुपये के 28,030 इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए, 2018 से अब तक इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए सबसे ज्यादा चंदा BJP को मिला है, 6 साल में चुनावी बॉन्ड से BJP को 6337 करोड़ की फंडिंग हुई, वहीं कांग्रेस को 1108 करोड़ चुनावी चंदा मिला, वास्तव में चुनाव आयोग की लिस्ट में शामिल 30 पार्टियों को कुल मिलाकर जितना दान मिला, उसका तीन गुना अकेले BJP को मिला है, ये भी जान लें कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में SBI को कठघरे में खड़ा किया है!

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