Home Mahanubhav मंडल कमीशन ने देश की राजनीतिक दशा बदल दी | Vishwanath Pratap Singh |

मंडल कमीशन ने देश की राजनीतिक दशा बदल दी | Vishwanath Pratap Singh |

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भाईसाब…क्या आपको पता है देश के आठवें प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सामाजिक न्याय के लिए 1990 में मंडल कमीशन लागू कर सुर्खियां बटोरीं थी। हालांकि, उन्होंने पीएम रहते हुए कई ऐसे फैसले लिए, जिसकी चर्चा आज भी होती है। साल 1989 के लोकसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी और बीजेपी के समर्थन से वीपी सिंह देश के आठवें प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान ही राजनीति शुरू कर दी थी। वीपी सिंह 1947-48 में वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज में छात्र संघ के अध्यक्ष थे। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने 1957 में भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और इलाहाबाद जिले के पासना गांव में खेत को दान में दिया था। वह प्रधानमंत्री के तौर पर देश की सत्ता पर काबिज हुए तो भारत ही नहीं बल्कि नेपाल तक के राजपूत समाज ने खुशी में दीप जलाया था।
आज हम अपने इस लेख के जरिये आपको भारत के पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के जीवन और उनकी राजनितिक यात्रा से परिचय कराएंगे और उनके जीवन यात्रा के बारे में बताएँगे….।

– सामाजिक न्याय की दिशा में उन्होंने ऐतिहासिक कदम उठाया।
– प्रधानमंत्री बनने नेपाल तक के राजपूत समाज ने खुशी में दीप जलाया था।
– बोफोर्स घोटाले को लेकर कांग्रेस को घेरा और जनता दल नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली।
– अयोध्या विवाद के हल की पहली कोशिश की थी।
– गोपाल विद्यालय इंटर कॉलेज के संस्थापक भी थे।

भाईसाब…वीपी सिंह का जन्म 25 जून 1931 को इलाहाबाद में राजा बहादुर राम गोपाल सिंह के घर हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद और पूना विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। उनकी 25 जून 1955 को सीता कुमारी के साथ शादी हुई थी। उनके दो बेटे हैं। वह इलाहाबाद के कोरॉव में स्थित गोपाल विद्यालय इंटर कॉलेज के संस्थापक भी थे। वह 1969 से 71 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कार्यकारी निकाय और उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य रहे। वे 1971 से 74 तक संसद (लोकसभा) के भी सदस्य रहे। हालांकि, बाद में उन्होंने वाणिज्य उपमंत्री, वाणिज्य संघ राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। उन्होंने 9 जून 1980 से 28 जून 1982 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार भी संभाला। वह केंद्रीय वित्त मंत्री भी रहे थे।
भाईसाब…आपको ये जानना भी जरूरी है कि जब कांग्रेस सरकार पर बोफोर्स घोटाले के आरोप लगे, उस समय वीपी सिंह देश के रक्षा मंत्री थे। बाद में उन्होंने केंद्र की राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस का साथ भी छोड़ दिया। बोफोर्स घोटाले को लेकर उन्होंने कांग्रेस को घेरा और जनता दल नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। उन्होंने 1989 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार के मुद्दे को जमकर उठाया।1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा, जिसके कारण राजीव गांधी के हाथों से केंद्र की सत्ता चली गई। इस चुनाव में वीपी सिंह की पार्टी जनता दल ने 143 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस 197 सीटें जीत पाई थी। हालांकि, वीपी सिंह ने भाजपा और कम्यूनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाईं और वह देश के आठवें प्रधानमंत्री बनें। उन्होंने अपनी सरकार के दौरान एक ऐतिहासिक फैसला लिया था। उन्होंने देश में मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया था। उनके इस फैसले से ओबीसी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिला। उनके इस कदम से पिछड़े समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा बदल गई।
लेकिन मंडल आयोग लागू किये जाने को लेकर सवर्ण समाज की नजर में वीपी सिंह विभाजनकारी व्यक्तित्व बन गए। उनके इस फैसले से सवर्ण समुदाय नाराज हो गया। इसे लेकर देशभर में आंदोलन भी हुए। मंडल कमीशन की सिफारिशों को देश में लागू करते ही वह सवर्ण समुदाय की नजर ‘राजा नहीं, ‘रंक’ और ‘देश का कलंक’ में तब्दील हो गए। यहीं से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ भी गिरने लगा।
इसके अलावा भाईसाब लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम मंदिर निर्माण के निकाली गई रथ यात्रा को उनकी सरकार ने रोक दिया था, जिसके चलते भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और वीपी सिंह की सरकार गिर गई थी। बतौर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अयोध्या विवाद के हल की पहली कोशिश की थी। उन्होंने दोनों पक्षकारों हिंदू और मुस्लिम से बातचीत के सिलसिले शुरू भी कराए। मामले में समझौते को लेकर संसद में ऑर्डिनेंस लाया जा रहा था, लेकिन सत्ता में साझीदार बीजेपी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और यह सरकार गिर गई जिस कारण सुलह की यह पहली कोशिश खत्म हो गई। सरकार के पतन की वजह सियासत ने ऐसी करवट ली कि ऑर्डिनेंस को वापस लेना पड़ा।
भाईसाब वीपी सिंह ने अपने कुछ फैसलों से किसी को खुश तो किसी को दुखी किया था और इसी कारण ‘राजा नहीं फकीर, देश की तकदीर’ और ‘राजा नहीं रंक, देश का कलंक’ जैसे नारे लगने लगे थे. कई जानकार कहते हैं कि उनकी सेवाओं व सीमाओं का राग व द्वेष से परे रहकर तटस्थ या वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन शायद ही कभी हो सके।
भाईसाब.. एक और बात जो उनके व्यक्तित्व को सबसे अलग बनाती थी वो था उनका ‘कवि’ होना…वो अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरो लेते थे. राजनेता होने के कारण उनके कवि पर एकदम से चर्चा ही नहीं हुई। उनका ‘एक टुकड़ा धरती-एक टुकड़ा आसमान’ शीर्षक कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ था. कविताओं में उन्होंने अपने पाठकों से सारी परदेदारी ही खत्म कर डाली। फिर वे खुलकर उनसे अपने जीवन के ‘रहस्य’ साझा करने लगे, इसकी एक मिसाल उनकी ‘मैं और वक्त’ शीर्षक यह छोटी कविता भी है:
‘मैं और वक्त…काफिले के आगे-आगे चले…चौराहे पर…मैं एक ओर मुड़ा..बाकी वक्त के साथ चले गये…’
ये बताना जरूरी है कि स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी और 27 नवंबर 2008 को उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली।
भाईसाब, आशा करते है, देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के बारे में यह जानकारी आपको पसंद आयी होगी…ऐसे ही शानदार जानकारी और नॉलेज हासिल करने के लिए हमसे जुड़े रहिये…।
धन्यवाद!

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