Home Latest धारा 370 पर सुप्रीम कोर्ट का “सुप्रीम फैसला” | Supreme Court’s “Supreme Decision”on Section 370

धारा 370 पर सुप्रीम कोर्ट का “सुप्रीम फैसला” | Supreme Court’s “Supreme Decision”on Section 370

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भाईसाब सुप्रीम कोर्ट ने को 5-0 के सर्वसम्मत फैसले में केंद्र द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 निरस्त करने को बरकरार रखा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अपने जजमेंट में दो अलग-अलग लेकिन सहमत राय लिखीं जिसमे याचिकाओं के तीन प्रमुख मुद्दों पर फैसला सुनाया गया है जिसमे पहला है जम्मू-कश्मीर की Unique और ‘स्पेशल स्टेटस’ पर।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 1947 में भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर ने संप्रभुता का कोई तत्व बरकरार नहीं रखा। अदालत ने कहा कि हालांकि रियासत के पूर्व शासक महाराजा हरि सिंह ने एक उद्घोषणा जारी की थी कि वह अपनी संप्रभुता बरकरार रखेंगे, उनके उत्तराधिकारी करण सिंह ने एक और उद्घोषणा जारी की कि भारतीय संविधान राज्य के अन्य सभी कानूनों पर हावी होगा। जिसको आसान भाषा में कहें तो हर अन्य रियासत की तरह जम्मू कश्मीर का भारत में विलय का यह प्रभावी Annexation (राज्य-हरण) था।

अदालत ने पुरजोर तरीके से कहा है की जम्मू और कश्मीर हमेशा भारत का अभिन्न अंग रहा है। सीजेआई चंद्रचूड़ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 और 370 के अलावा, जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान की धारा 3 का भी हवाला दिया जिसमे लिखा है: “जम्मू और कश्मीर राज्य भारत संघ का अभिन्न अंग है और रहेगा।” और राज्य के संविधान में यह भी प्रावधान है कि धारा 3 के प्रावधान में संशोधन नहीं किया जा सकता है।
वहीँ जस्टिस कौल ने कहा कि अपने स्वयं के संविधान वाला एकमात्र राज्य होना भी किसी विशेष दर्जे को परिभाषित नहीं करता है। उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर संविधान का उद्देश्य राज्य में रोजमर्रा का शासन सुनिश्चित करना था और अनुच्छेद 370 का उद्देश्य राज्य को भारत के साथ एकीकृत करना था।”
ये तो था पहले मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, दूसरा था की , क्या अनुच्छेद 370 संविधान का ‘अस्थायी’ या स्थायी प्रावधान है?

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान है। सीजेआई चंद्रचूड़ ने ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा की यह “अस्थायी” प्रावधान 1947 में राज्य में व्याप्त युद्ध जैसी स्थिति से निपटने के उद्देश्य से राज्य के संविधान में निहित किया गया था।
वही तीसरा मुद्दे के जवाब में जो की अनुच्छेद 370 के प्रभावी निरस्तीकरण से संबंधित था उस पर सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2019 की दोनों राष्ट्रपति घोषणाओं को बरकरार रखा। असल में ये दो राष्ट्रपति उद्घोषणाओं ने ही अनुच्छेद 370 को राज्य में निरस्त कर दिया था। जिसमे “जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा” को “जम्मू और कश्मीर की विधान सभा” का नया अर्थ देने वाली घोषणा भी शामिल था।

मुख्य मुद्दा यह भी था कि क्या राष्ट्रपति शासन के अधीन होने पर राज्य की शक्तियां संभालने वाले संघ द्वारा ये कार्रवाई की जा सकती है। यहां, सुप्रीम कोर्ट ने ‘एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ’ मामले में 1994 के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया, जो राष्ट्रपति शासन के तहत राज्यपाल की शक्तियों और सीमाओं से संबंधित था। सीजेआई डी.वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि राज्यपाल राज्य विधायिका की “सभी या कोई भी” भूमिका निभा सकते हैं और ऐसी कार्रवाई का न्यायिक परीक्षण केवल असाधारण मामलों में ही किया जाना चाहिए। बोम्मई फैसले की व्याख्या पर भरोसा करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “प्रथम दृष्टया ऐसा कोई मामला नहीं है कि राष्ट्रपति के आदेश दुर्भावनापूर्ण थे या शक्ति का अनुचित प्रयोग थे।”

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