Home Mahanubhav नायक और खलनायक का मिश्रण रूप | Sanjay Gandhi |

नायक और खलनायक का मिश्रण रूप | Sanjay Gandhi |

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भाईसाब…गांधी परिवार में एक शख्स ऐसा भी हुआ था..। जिसके इशारों से एक समय देश और कांग्रेस नाच रहे थे, ये शख्स और कोई नहीं इंदिरा गांधी के बेटे, राजीव गांधी के भाई और मेनका गांधी के पति संजय गांधी थे। इतिहास ने संजय गांधी को कई तरीके से याद रखा हुआ है। राजीव गांधी के तुलना में संजय एक लापरवाह या गैरजिम्मेदार भाई बताए गए. कभी उनकी पहचान हुई एक ऐसे बेटे के तौर पर जिसने माँ की सत्ता का इस्तेमाल अपने लिए ज्यादा किया। अपने लिए भी नहीं बल्कि अपनी जिद के लिए। गांवों के बुजुर्ग आज भी अपनी स्मृति में संजय गांधी की जबरदस्ती नसबंदी योजना जिंदा रखे हुए हैं। आपातकाल के लिए जिम्मेदार इंदिरा थीं, लेकिन पीछे का दिमाग़ संजय थे…।

भाईसाब..इंदिरा गांधी और फीरोज गांधी के दो बेटों में से छोटे, संजय गांधी का जन्‍म 14 दिसंबर, 1946 को हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई देहरादून और उसके बाद स्विट्जरलैंड के इंटरनेशल बोर्डिंग स्कूल में हुई थी. लेकिन उनकी दिलचस्पी पढ़ाई में कम और मशीनों में ज्यादा थी. बचपने से ही उन्हें मशीनें ठीक करने का बहुत जुनून था। पढ़ाई में हमेशा ही औसत ही रहे संजय गांधी को मशीनों के अलावा खेलों में भी खासी रुचि थी। वे किसी यूनिवर्सिटी में तो नहीं पढ़े लेकिन उन्होंने इंग्लैंड में रोल्स रायस ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग में तीन साल की इंटर्नशिप की. उनकी स्पोर्ट्स कारों और विमानों के एक्रोबैट्स में गहरी रुचि थी। उनके पास पायलट का लायसेंस भी थी। यहां तक कि भारत में मारुति उद्योग की शुरुआत के लिए उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं और फिर संजय गांधी अपनी इंटर्नशिप बीच में ही छोड़ कर देश वापस आ गए। इंदिरा गांधी के सत्ता संभालने के बाद कांग्रेस में बहुत सारे बदलाव आए और जैसे जैसे इंदिरा गांधी की पार्टी में पकड़ मजबूत होती गई, संजय गांधी का भी पार्टी में भी रुतबा बढ़ता गया।
भाईसाब…इंदिरा गांधी के बारे में माना जाता है कि वे संजय गांधी की किसी भी बात को अनसुना नहीं करती थीं और ना ही वे संजय गांधी के किसी फैसले के खिलाफ जाती थीं या उसे रद्द करतीं थी। यही वजह थी की इस तरह से संजय गांधी को एक तरह की समांतर सत्ता मिल गई थी और औपचारिक पद ना होने के कारण वे पूरी तरह से निरंकुश भी हो गए थे. हालांकि, इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी भले ही प्रधानमंत्री न बन सके, लेकिन भारतीय राजनीति के विश्लेश्कों का मानना है कि उन्होंने साल 1973 से लेकर साल 1977 के बीच अप्रत्यक्ष तौर पर देश का कार्यभार संभाला। दरअसल, राजनीतिक पंडितों यह भी मानते हैं कि इस दौर में संजय गांधी ने भारत सरकार को कई महत्वपूर्ण फैसले लेने के लिए विवश कर दिया था। साल 1970 के दशक में वो भारतीय युवा कांग्रेस के नेता बने और इसके बाद साल 1980 तक उन्होंने देश की राजनीति में अमिट छाप छोड़ दिया।
भाईसाब…संजय गांधी को इंदिरा गांधी के उत्ताराधिकारी के तौर पर भी देखा जाता था। माना जाता है कि जब 25 जून को आपातकाल की घोषणा हुई तो उसके बाद लगभग ढाई साल तक संजय गांधी ने ही देश की बागडोर अपने हाथों में संभाले रखा। साल 1976 के सितंबर महीने में उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया, जिसे आज भी देश के बुजुर्गों को याद है। उन्होंने देशभर में पुरुष नसबंदी का करवाने का आदेश दिया। इस निर्णय के पीछे सरकार की मंशा थी कि देश की आबादी को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन, देशभर में कई लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करवाई गई। एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि एक साल में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी करवाई गई। बताया जाता है कि 16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्गों की नसबंदी करा दी गई। अगर देश में नसबंदी जैसी दमनकारी फैसले के लिए संजय गांधी को जिम्मेदार माना जाता है।
भाईसाब…आपके ये जानना भी जरूरी है कि भारत में मारुति 800 को भारत में लाने का श्रेय भी उन्हीं को दी जाती है। संजय गांधी का सपना था कि भारत में आम लोगों के पास कार हो। इसके लिए उन्होंने दिल्ली के गुलाबी बाग में एक वर्कशॉप भी तैयार करवाया। 4 जून 1971 को मारुति मोटर्स लिमिटेड नामक एक कंपनी का गठन किया गया और इस कंपनी के पहले एमडी संजय गांधी खुद थे। कंपनी को कार बनाने और बेचने का लायसेंस आसानी से मिल गया था। भाईसाब…मजेदार बात यह है कि जब तक संजय गांधी जिंदा रहे तब तक कंपनी ने एक कार का भी उत्पादन नहीं किया और बाद यही कंपनी देश की एक बड़ी और सफल कार निर्माता कंपनी के रूप में उभरी। दरअसल आपातकाल के पहले ही संजय गांधी राजनीति में सक्रिय हो गए और यह परियोजना एक तरह से ठंडे बस्ते में चली गई। लेकिन अगले चुनाव तक सत्ता से बाहर रहते हुए संजय गांधी पार्टी में फिर सक्रिय हुए। संजय गांधी ने इस बार अपने कौशल से दिखा दिया कि वे एक मां के लाड़ प्यार में बिगड़े बच्चे नहीं हैं और ना ही कोई सनकी तानाशाह मानसिकता वाले व्यक्ति। उन्होंने कांग्रेस में पार्टी स्तर पर जान फूंकी और 1980 के चुनाव में उनकी ही चतुर रणनीति इंदिरा गांधी की प्रचंड जीत से सत्ता में वापसी हुई जिस इंदिरा गांधी के खिलाफ तीन साल पहले पूरा देश खड़ा हो गया था।
भाईसाब..संजय गांधी की लवलाइफ भी काफी दिलचस्प है। सबसे पहले उनकी जिंदगी में एक मुस्लिम लड़की ने दस्तक दी, लेकिन दोनों के बीच के रिश्तों में जल्द ही दरार आ गई। इसके बाद उन्हें एक जर्मन लड़की सैबीन वॉन के साथ मोहब्बत हो गई। सैबीन वॉन, वही लड़की थी, जिसने राजीव गांधी की मुलाकात सोनिया गांधी से करवाई थी। दोनों एक दूसरे को कोफी पसंद भी करते थे, लेकिन किसी अनबन की वजह से दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई। सैबीन के साथ दूरियां बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह थी कि वो अपनी प्रेमिका से ज्यादा समय अपने ड्रीम प्रोजेक्ट यानी भारत में मारूति कंपनी को स्थापित करने के कामों पर ज्यादा दे रहे थे। दो लड़कियों की जिंदगी से जाने के बाद उनके जीवन में मेनका गांधी का आगमन हुआ था। इन दोनों की प्रेम कहानी की शुरुआत 14 सितंबर 1973 को होती है। संजय गांधी अपने दोस्त की शादी की पार्टी में गए थे। इसी दिन संजय गांधी का जन्मदिन भी था। इस पार्टी में उनकी मुलाकात मेनका आनंद से हुई। मेनका गांधी की बात करें तो उनके पिता तरलोचन सिंह लेफ्टनेंट कर्नल थे। वहीं, जब उनकी संजय से मुलाकात हुई थी। वो महज 17 साल की थीं, वहीं संजय उनसे 10 साल बढ़े थे। पहली मुलाकात के बाद दोनों एक दूसरे के साथ वक्त बिताने लगे। दोनों ने आखिरकार 23 दिसंबर 1974 को शादी रचाई। यह शादी संजय गांधी के पुराने दोस्त मुहम्मद यूनुस के घर में हुआ। इंदिरा गांधी ने मेनका गांधी को 21 बेहतरीन साड़ियां दी। इनमें से एक वो भी साड़ी थी जो जवाहर लाल नेहरू ने जेल में बुनी थी।
भाईसाब…ये भी जानना जरूरी हे कि आपातकाल समाप्त होने के बाद संजय गांधी मार्च 1977 में अपने पहले चुनाव में खड़े हुए, लेकिन उन्हें अपने ही निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में करारी हार का सामना करना पड़ा। हार की सबसे वजह आपातकाल थी, जिससे लोग कांग्रेस से खफा थे। हालांकि, संजय गांधी ने जनवरी 1980 में हुए आम चुनावों में अमेठी से जीत हासिल की। शादी के तकरीबन 6 साल के बाद संजय गांधी की एक विमान हादसे में मौत हो गई। 23 जून 1980 की सुबह वो और दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना ने सफदरगंज के दिल्ली फ्लाइिंग कल्ब से उड़ान भरी। हवा में जब विमान कलाबाजियां दिखा ही रहीं थी कि तभी विमान का पिछला इंजन ने काम करना बंद कर दिया। विमान सीधे दिल्ली के अशोक होटल के पीछे की खाली जमीन पर जाकर टकरा गया। इस हादसे में दोनों की मौत हो गई।
…तो ये थी जानकारी संजय गांधी के बारे में, आशा करते है यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही अन्य महानुभाव की जानकारी के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ…., धन्यवाद!

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