Home Latest संत मठ छोड़ चुनावी रण में कूदे ! | Saints in Politics |

संत मठ छोड़ चुनावी रण में कूदे ! | Saints in Politics |

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भाईसाब…क्या आपको पता है…! सियासत में संतों और नेताओं का गठजोड़ पुराना है। साधु-संत पहले जमीन पर पकड़ बनाते हैं और फिर धर्म का तड़का लगाकर नेताओं को कुर्सी तक पहुंचाते हैं। कुर्सी पर पहुंचने के बाद राजनेता भी इस कर्ज को बखूबी अदा करते हैं। भाईसाब…लोग सवाल करते हैं…सत्ता के लिए साधु-संत क्यों जरूरी?…तो इसका जवाब है कि अधिकांश कथा वाचक या साधु-संत फर्राटेदार बोलते हैं। ऐसे में वे चुनावी साल में राजनीतिक दलों के लिए माहौल बनाने का काम करते हैं। कम्प्यूटर बाबा पहले बीजेपी की शिवराज सरकार के पक्ष में माहौल बना रहे थे, लेकिन आश्रम पर छापे पड़ने के बाद घूम-घूमकर सरकार के विरोध में बयान दे रहे हैं। भाईसाब…चुनावी सालों में राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों की विशेष जरूरत होती है, जो किसी मुद्दे पर जनता के बीच माहौल तैयार करें। साधु-संत इस काम को बखूबी से अंजाम देते हैं, जिस वजह से राजनीतिक दलों को संतों खूब भाते हैं। इतना ही नहीं, कई संत नेताओं को पार्टी का टिकट दिलाने में भी मदद करते हैं। सत्ता में आने के बाद नेता भी संतों और कथावाचकों का कर्ज उतारने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं।

तो भाईसाब, आज के इस लेख में संतों और नेताओं के गठजोड़ पर प्रकाश डालेंगे…।
भाईसाब…हाल ही एक रिपोर्ट जारी की गई है जिसके मुताबिक मध्य प्रदेश की 230 में 100 विधानसभा सीटें ऐसी है, जहां किसी न किसी संत और आश्रम का प्रभाव है। ऐसे में चुनावी साल में सत्ता के लिए ये सभी संत और आश्रम नेताओं के लिए जरूरी हो जाते हैं। कई बार संत सीधे तौर पर वोटरों से किसी पार्टी के पक्ष में वोट करने की अपील करते हैं, तो कई बार अंदरूनी तौर पर संदेश भेज देते हैं। दोनों ही सूरत में राजनीतिक दलों को फायदा होता है। करीबी मुकाबलों में संतों की भूमिका और ज्यादा बढ़ जाती है। हर चुनाव में 30-40 सीटें ऐसी रहती है, जहां जीत का मार्जिन 5-10 हजार के बीच रहता है।
भाईसाब…पहले के जमाने की बात करें तो संत ऐसे नहीं हुआ करते थे…कबीर ने कहा था- संत को सीकरी से क्या काम! वो फतेहपुर सीकरी जाकर मुगल बादशाह से मिलने के इच्छुक नहीं थे। वहीं संत तुलसीदास ने भी रहीम से कहा था- अब हम क्या बनें नर के मनसबदार (पद या रैंक) ! समर्थ रामदास ने भी छत्रपति शिवाजी महाराज को नीति पूर्वक शासन चलाने के लिए कहा था। भाईसाब…समय एक सा नहीं रहता। संतों, साधुओं और प्रवचनकारों ने भी राजनीति में भाग लेना और चुनाव लड़ना शुरू कर दिया। राजनीतिक पार्टियां भी उनकी लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए उन्हें उम्मीदवारी देने के लिए तत्पर रहती हैं। इनमें से कुछ को राजनीति में सफलता मिलती है तो कुछ मिसफिट होकर रह जाते हैं…भाईसाब…अब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में एक नजारा हर कहीं देखने को मिल रहा है…कोई भगवा पहने अपनी टोली के साथ घर-घर जा रहा है, तो कोई शंख फूंकते और दंड प्रणाम करते हुए बीच सड़क से गुजर रहा है…इस चुनाव में कई संत मठ छोड़ चुनावी रण में कूद चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा बुधनी सीट से लड़ने वाले मिर्ची बाबा और रायपुर सीट से लड़ने वाले महंथ रामसुंदर दास की है। मिर्ची बाबा बुधनी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनौती देंगे। बुधनी सीट बीजेपी का अभेद्य किला माना जाता है। वहीं रायपुर दक्षिण सीट पर कांग्रेस सिंबल से उतरे महंथ रामसुंदर दास बीजेपी के बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। यह सीट भी बीजेपी का गढ़ है। वहीं मध्यप्रदेश की रीवा सीट पर सबके महाराज नाम से मशहूर सुशील सत्य महाराज मैदान में हैं। वे 2018 में भी इसी सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। सुशील महाराज के दावे के मुताबिक पारिवारिक विरक्तियों की वजह से वे हिमालय पर चले गए, जहां उन्होंने 10 वर्षों की घनघोर तपस्या की। महाराज ने पत्रकारों से बताया कि रीवा का विनाश मुझसे देखा नहीं गया, इसलिए चुनाव में उतर गया। वहीं राजस्थान में बीजेपी ने जयपुर की हवामहल सीट से बाल मुकुंद आचार्य, अलवर जिले की तिजारा सीट से बाबा बालकनाथ, जैसलमेर की पोखरण सीट से प्रतापपुरी महाराज तथा सिरोही सीट से महंत ओटाराम देवासी को उम्मीदवारी दी है। कांग्रेस भी कहां पीछे रहनेवाली थी! उसने रामजन्मभूमि आंदोलन में अग्रणी रहे आचार्य धर्मेंद्र की पुत्रवधु डा। अर्चना शर्मा को जयपुर की मालवीय नगर सीट से प्रत्याशी बनाया। पोखरण से मुस्लिम समाज के धर्मगुरू गाजी फकीर के बेटे सालेह मोहम्मद को उम्मीदवारी दी है।
भाईसाब…अब इसमें भी विराम लग गया है कि कोई संत सत्ता की बागडोर संभाल सकता है…उत्तरप्रदेश को ही ले लीजिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक सफल, प्रभावशाली और दृढ़निश्चयी राजनेता के रूप में सामने आए। वे गोरखपीठ के प्रमुख हैं। पहले लोकसभा सदस्य रहे। बाद में यूपी के सीएम बने। उन्होंने अपराधियों व असामाजिक तत्वों के प्रति सख्त रवैया अपनाया। दंगाइयों और दबंगों के घरों पर बुलडोजर चलवाया। प्रदेश की कानून-व्यवस्था संभालने व सुधारने में अग्रणी भूमिका निभाई। योगी के नेतृत्व में यूपी में बीजेपी काफी मजबूत बनी। लेकिन वहीं दूसरी ओर उमा भारती में ऐसी निरंतरता देखने को नहीं मिली। लोधी समाज के वोटों पर पकड़ तथा बुंदेलखंड में अच्छे प्रभाव के कारण उन्हें मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री और बाद में केंद्रीय मंत्री बनाया गया लेकिन वे कोई उल्लेखनीय काम नहीं कर पाईं। जब वे मुख्यमंत्री थीं तो अपनी जगह बाबूलाल गौर को शपथ दिलवाकर खुद झंडा सत्याग्रह करने कर्नाटक के हुबली चली गई थीं। यह सनक उन्हें महंगी पड़ी, वहां से लौटने पर गौर ने उन्हें सीएम पद वापस देने से इनकार कर दिया। केंद्रीय मंत्री के रूप में नमामि गंगे प्रोजेक्ट में विफल रहीं। प्रधानमंत्री मोदी को उनकी निष्क्रियता पसंद नहीं आई। उन्हें पदमुक्त कर दिया गया। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान में भी उमा को शामिल नहीं किया गया। इनके अलावा साक्षी महाराज, साध्वी प्राची, साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर बीजेपी सांसद के रूप में समय-समय पर भड़कानेवाले बयान देते रहे। वे बीजेपी को कट्टर हिंदूवादी पार्टी की शक्ल में पेश करना चाहते हैं। साध्वी प्रज्ञा ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमा मंडन किया था। इनके अलावा अन्य संत भी राजनीति के मोह में फंसे नजर आते हैं।
भाईसाब…एक खास बात और, माना जाता है कि संत की गरिमा इसी में है कि राजनेताओं का नैतिक मार्गदर्शन करें और उन्हें ईमानदारी से जनसेवा के लिए प्रेरित करें। लेकिन धर्म और राजनीति के घालमेल में कोई पार्टी पीछे नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या संतों को राजनीति में आना चाहिए? ये सवाल मैं आपके लिए छोड़े जा रहा हूं…। आशा करते हैं यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसे ही अन्य खास विषय के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ, धन्यवाद!

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