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सियासी स्वार्थ साधने का साधन बना आरक्षण | Reservation: a political interests

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भाईसाब, क्या आप जानते हैं! अमेरिका समेत पश्चिमी और यूरोपीय देश इतने विकासित क्यों हैं, हम आपको बताते हैं क्योंकि इन देशो में टैलेंट की कद्र की जाती है और टैलेंट को बढ़ावा दिया जाता है। आपने कभी सोचा है हाल ही में यूक्रेन में मेडीकल की पढ़ाई करने गए भारतीय बच्चे वहां युद्ध में क्यों फंस गये थे, क्योंकि हमारे देश से प्रतिभा का पलायन हुआ ता। भारत में MBBS 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हमारे देश में कई होशियार छात्र नीट परीक्षा में 95 से ज्यादा प्रतिशत नंबर लाने के बावजूद सरकारी कालेज में MBBS की सीट हासिल नहीं कर पाते हैं। इसके चलते उन्हें यूक्रेन या अन्य देश जाना पड़ा है। तो भाईसाब, आज के इस लेख में हम इस बात पर गंभीरता से विचार करेंगे कि इस देश में आरक्षण कितना उचित हैं ? और देश में चल रही आरक्षण व्यवस्था पर प्रकाश डालेंगे।

भाईसाब, आपके लिए ये जानना बहुत जरूरी है कि अपने सियासी स्वार्थ साधने की कोशिश में अक्सर राजनीतिक पार्टियां और सरकारें संवैधानिक मर्यादाओं के परे जाकर भी वादे और फैसले कर जाती हैं। और भाईसाब, आपको मालूम होना चाहिए कि हाल ही में संवैधानिक मर्यादाओं को हरियाणा सरकार ने भी पार किया है। हरियाणा सरकार ने कानून बना कर तय कर दिया कि उन सभी निजी कंपनियों, संस्थानों और संस्थाओं को अपने यहां नौकरियों में हरियाणा के युवाओं को 75 फीसदी आरक्षण देना होगा, जिनमें 10 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और उनका वेतन 30 हजार रुपए से कम है। भाईसाब, जिस तरह राजनीतिक दल पूरे देश में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर अपना जनाधार बनाने की कोशिश करते देखे जाते हैं, उसमें हरियाणा सरकार का यह कदम नया नहीं कहा जा सकता। अच्छी बात है कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उस कानून को रद्द कर दिया। वहीं हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती देने का ऐलान किया है। दरअसल, इस आरक्षण का वादा विधानसभा चुनाव के वक्त जननायक जनता पार्टी ने किया था। फिर जब सत्ता गठबंधन में शामिल हुई तो उसने यह कानून भी बना दिया। हर कल्याणकारी सरकार का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को रोजी-रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए। मगर इसके लिए संविधान में दिए गए समानता और जीवन जीने के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरों के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। ऐसी कोई सरहद नहीं बनाई जा सकती, जिसमें दूसरे इलाकों के लोगों का प्रवेश वर्जित हो।
भाईसाब, हरियाणा में निजी क्षेत्र में आरक्षण देने की सरकार की पहल को हाईकोर्ट से लगे झटके के बाद अब बिहार को लेकर भी सवाल उठ रहा है। बिहार में आरक्षण का दायरा बढ़ाने के फैसले को भी कोर्ट से झटका लग सकता है इसे लेकर लोगों के मन में संशय चल रहा है। बिहार में आरक्षण के नए प्रावधान के अनुसार अब अनुसूचित जाति को 20 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 2 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग को 18 प्रतिशत और अत्यंत पिछड़ा वर्ग को 25 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा। यह कुल 65 प्रतिशत आरक्षण होता है। वहीं 10 प्रतिशत आरक्षण आर्थिक पिछड़ा वर्ग को मिलेगा। इस प्रकार कुल आरक्षण 75 प्रतिशत होता है। लेकिन बिहार सरकार के निर्णय को अगर कोर्ट में चुनौती दी जाती है उस स्थिति में कोर्ट का फैसला बेहद अहम होगा। इसके पहले 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण पर महाराष्ट्र सरकार को बड़ा झटका दिया था। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र में मराठों के लिए 16 फ़ीसदी आरक्षण देने के राज्य सरकार के निर्णय को निरस्त कर दिया था। वर्तमान में महाराष्ट्र में फिर से मराठा आरक्षण की आग लग गई है। इसे मांग के लेकर महाराष्ट्र में कई लोग आत्महत्या भी कर चुके हैं। भाईसाब, आपकी जानकारी के बता दें कि सामाजिक कार्यकर्ता मनोज जरांगे मराठा आरक्षण की अपनी मांग को लेकर महाराष्ट्र बर का दौरा कर रहे हैं, दूसरी ओर हर राजनीतिक पार्टी इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेंक रही हैं।
भाईसाब, आपको बता दें कि देश में आरक्षण की व्यवस्था 1960 में शुरू की गई थी। इस दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि यह आरक्षण केवल 10 साल के लिए होना चाहिए। हर 10 साल में यह समीक्षा हो कि जिनको आरक्षण दिया जा रहा है, क्या उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ है कि नहीं? उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था का लाभ नहीं देना चाहिए, क्योंकि आरक्षण का मतलब बैसाखी नहीं है, जिसके सहारे सारी जिंदगी जी जाए। यह तो विकसित होने का एक आधार मात्र है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। आज जब भारत तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहा है, तो उसे फिर से पीछे धकेलने की साजिश क्यों की जा रही है? आरक्षण को अभी भी जारी रखना समाज को एक तरह से दो हिस्सों में बांटने की साजिश करना है। आरक्षण आज देश की जरूरत नहीं है। हम सोचते हैं कि दलित वर्ग इस आरक्षण को हटाने की पहल करेगा, लेकिन यह कतई संभव नहीं। जिन लोगों को बैसाखी के सहारे की आदत पड़ गई है, वे कभी अपनी बैसाखी हटाने के लिए नहीं कहेंगे।
भाईसाब, वर्तमान हकीकत से आप मुंह नहीं मोड़ सकते, आपको पता होना चाहिए कि भारत तेजी से बदल रहा है। जातिगत व्यवस्था से ही एक उदारवादी वर्ग उभरा है, जहां दलितों को बराबरी का दर्जा दिया गया है। अब देश में पहले की तरह भेदभाव नहीं रहा, हालात पूरी तरह नहीं, तो बहुत हद तक बदल गए हैं। देश में सवर्णों ने आरक्षण की मांग उठाई। अन्य कई वर्ग भी आरक्षण की मांग उठा रहे हैं। आखिर क्यों ऐसी स्थिति बन रही है? ये सवाल भाईसाब, मैं आपके लिए छोड़े जा रहा हूं, आप अपना जवाब कमेंट बॉक्स में अवश्य दीजिए।
तो भाईसाब, आशा करते हैं यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसे ही अन्य ज्वलंत जानकारी के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ, धन्यवाद!

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