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राम प्रसाद बिस्मिल

by bs_adm_019
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“देश हित पैदा हुए है देश पर मर जायेंगे
मरते मरते देश को ज़िंदा मगर कर जायेंगे”
शरीर के रोम रोम में आज़ादी का ज़ज़्बा लिए उस युवा क्रांतिकारी को शत शत नमन जिसके नाम और किस्से आज भी हर देशवासी के लहू की गर्मी को देश के लिए जागृत कर देते हैं .
भाई साब! नमस्कार।

आज हम बात करेंगे एक ऐसे क्रन्तिकारी की, जिनका दिल सिर्फ हिंदुस्तान के लिए धड़कता रहा और जिनकी कलम सिर्फ हिन्दुस्तान की आज़ादी पुकारती रही।
“राम प्रसाद बिस्मिल” एक ऐसा नाम जो भारत की आज़ादी के लिए 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में हँसते हँसते फांसी के फंदे को गले लगाया।

अगर राम प्रसाद बिस्मिल के परिचय की बात करें तो:
राम प्रसाद बिस्मिल एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ एक अद्भुत लेखक और कवी भी थे।
भारतीय राष्ट्रवादी और आर्य समाज मिशनरी भाई परमानंद को दी गई मौत की सजा के बारे में पढ़ने के बाद स्वतंत्रता और क्रांति के आदर्श उनके मन में घर सा कर गया।
उन्होंने अपना क्रोध अपनी कविता ‘मेरा जन्म’ के ज़रिए ज़ाहिर किया। तब वह सिर्फ 18 साल के थे।
बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1987 में शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश की गोद में हुआ। उनके माता-पिता का नाम मुरलीधर और मूलमती देवी था, इनके ५ बहने और एक भाई भी थे।
बिस्मिल ने ‘राम’, ‘अज्ञात’, और ‘बिस्मिल’ उपनामों से उर्दू और हिंदी में सशक्त देशभक्ति कविताएँ लिखना शुरू किया। जिसने अनेक भारतियों को आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया

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क्रन्तिकारी कार्य:
वह 19 साल की उम्र में पंडित गेंदा लाल दीक्षित के नेतृत्व में एक क्रांतिकारी समूह में शामिल हो गए।
दीक्षित के साथ, बिस्मिल ने इटावा, मैनपुरी, आगरा और शाहजहाँपुर जैसे क्षेत्रों से युवाओं को संगठित करना शुरू किया ताकि वे ‘मातृवेदी’ और ‘शिवाजी समिति’ जैसी संस्थाओं का आयोजन कर सके।
इन संस्थाओ के लिए धन इकट्ठा करने के लिए उन्होंने सरकारी खजाने को लूटा।
सन 1923 में इन्होने अपने अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिल कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन की स्थापना की।

इन सब के साथ सबसे अहम् था मैनपुरी और काकोरी का लूट काण्ड जो इनके फांसी की सजा के कारण बने:
उन्होंने 1918 में मैनपुरी षडयंत्र में भाग लिया, फिर 1925 में लखनऊ के पास काकोरी में लूट का हिस्सा बने।
बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, सचिन्द्र बक्शी, और राजेंद्र लाहिड़ी ने लखनऊ से ठीक पहले काकोरी नामक कस्बे में एक ट्रेन रोकी और ब्रिटिश सरकार के नकदी बक्से लूट लिए।
काकोरी षडयंत्र में मुकदमा चलने के बाद इन चारों क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई गई। और इनको उत्तरप्रदेश के अलग अलग जेलों में फांसी की सजा दी गयी।

साहित्यिक योगदान:
लखनऊ सेंट्रल जेल के बैरक नंबर 11 में, बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा लिखी जिसका टाइटल था “काकोरी के सहीद”, जिसे हिंदी साहित्य की बेहतरीन कृतियों में से एक माना जाता है।
राम प्रसाद बिस्मिल के कविता संग्रह – ‘मन की लहर’ और ‘स्वदेशी रंग’ प्रसिद्ध हैं।
युवा स्वतंत्रता सेनानियों के लिए उर्दू कवि बिस्मिल अजीमाबादी द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध पंक्तियाँ
“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-कातिल में है”
राम प्रसाद बिस्मिल का युद्ध घोष था।

उनके शरीर के हर इंच में स्वतंत्रता की चाहत और उनकी कविता में क्रांतिकारी भावना की गूंज के साथ, राम प्रसाद बिस्मिल सबसे उल्लेखनीय भारतीय क्रांतिकारियों में से थे, जिन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद से लड़ाई लड़ी और सदियों के संघर्ष के बाद देश के लिए आजादी की हवा में सांस लेना संभव बनाया।
धन्यवाद!
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