Home Gali Nukkad मराठा आरक्षण पर सुलगा महाराष्ट्र | Maharashtra’s Protest over Maratha Reservation |

मराठा आरक्षण पर सुलगा महाराष्ट्र | Maharashtra’s Protest over Maratha Reservation |

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भाईसाब, महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा आरक्षण का मुद्दा गरमाया हुआ है। मराठा समुदाय के लोगों के लिए आरक्षण की मांग एकनाथ शिंदे सरकार के लिए जी का जंजाल बनती जा रही है। मनोज जारांगे और उनके समर्थक अपना विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए राजी नहीं है। वहीं राज्य सरकार ने हाल ही में सर्वदलीय बैठक भी बुलाई और इस मुद्दे का हल निकालने की कोशिश लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। जरांगे अपनी मांग पर डटे हुए हैं। भाईसाब, आज हम आरक्षण जैसे ज्वलंत मुद्दे पर अपने इस लेख के जरिये अपने दर्शकों को बताने की कोशिश करेंगे कि कैसे आरक्षण नेताओं के लिए वोट पाने का सरल हथियार बन गया है।
आज के इस लेख में हम बात करेंगे महाराष्ट्र में धघकते मराठा आरक्षण की जिसने नेताओं की रातों की नींद हराम कर दी है। मराठा आरक्षण की आग पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। हम मराठा आरक्षण को आसान भाषा में समझेंगे और हां अंत में मेरा एक सवाल है जिसका जवाब कमेंट में जरूर दें…

भाईसाब महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन तीव्र हो उठा है। पिछले 15 दिनों में करीब 13 आंदोलनकारी हताशा में आत्महत्या कर चुके हैं। प्रदेश के 30 बस डिपो बसों का परिचालन पूरी तरह से बंद हो चुके हैं, 22 सरकारी बसें अभी तक पूरी या आंशिक रूप से फूंकी जा चुकी हैं, जिस कारण प्रदेश के कई क्षेत्रों में उनका चलना मुश्किल हो गया है। भाईसाब, आज हालात ये हो चुके हैं कि पुलिस की मौजूदगी में भी महाराष्ट्र के विधायक तक पूर्णतः सुरक्षित नहीं हैं। जिस समय बीड़ के माजलगांव विधानसभा के विधायक प्रकाश सोलुंके के घर में आंदोलकारी पथराव कर रहे थे, उस समय पुलिस के एक दर्जन जवान वहां मौजूद थे, लेकिन वह उन्हें रोक पाने की स्थिति में नहीं थे। आन्दोलनकारियों ने घर में आग लगा दी, 5 मोटर साइकिलें और तीन कारें जलकर राख हो गईं। अगर इस समय तक एक ट्रक से ज्यादा पुलिस वाले मौके पर नहीं पहुंचे होते तो विधायक और उनका परिवार पता नहीं किस हालत में होता।
भाईसाब, कुल मिलाकर अगर देखें तो महाराष्ट्र आरक्षण से ज्यादा हताशा में जल रहा है। राज्य सरकार की कुल 5,50,000 नौकरियां हैं और अकेले मराठों की आबादी 4 करोड़ से ऊपर है, जिसमें नौकरी चाहने वाले युवा 38 लाख से ऊपर हैं। प्रदेश में अगर बेरोजगारी की सरकारी दर को ही मान लिया जाए तो इस समय महाराष्ट्र में कम से कम 15 से 16 लाख नौकरियां अगर मराठा युवकों को देना संभव हो, तब कहीं जाकर इस आंदोलन का मकसद संभव हो सकता है, जो कि सपने में भी संभव नहीं है। महाराष्ट्र की 12 करोड़ 66 लाख से ज्यादा आबादी में करीब 34 फीसदी मराठा हैं और इन मराठों में करीब 76 फीसदी महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।
भाईसाब आज स्थिति यह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी पार्टियों के राजनेता डरे हुए हैं कि अगर जल्द इस पर काबू नहीं पाया गया तो भारी अव्यवस्था फैल जायेगी। इसलिए हर कोई लगभग एक जैसी भाषा बोलने लगा है। इन्हीं राजनेताओं में वो लोग भी हैं, जिन्होंने एक दूसरे पर आरोप लगाकर यह माहौल बनाया कि दूसरा, मराठों को आरक्षण नहीं देना चाहता, जिसकी वजह से प्रदेश में मराठा पिछड़े हुए हैं।
भाईसाब हकीकत यह है कि महाराष्ट्र में जिन मराठों को आरक्षण के बिना बुरी स्थिति में पहुंचाया गया बताया जा रहा है, उन्हीं के हाथ में ज्यादा से ज्यादा राजसत्ता और संसाधन हैं।
भाईसाब, आरक्षण के अपने तर्क हो सकते हैं और यह भी सही है कि महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के द्वारा आरक्षण की मांग पिछले चार दशकों से हो रही है। राजनीतिक पार्टियां अपने तात्कालिक स्वार्थ के लिए समुदायों को न सिर्फ आधी अधूरी बातें बताती हैं बल्कि ऐसे राजनीतिक फैसलों में उलझा देती हैं कि अंत में वो ठगे जाते हैं। पिछली फडणवीस सरकार ने मराठाओं को 16 फीसदी आरक्षण दे दिया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में घटाकर 13 फीसदी और शैक्षणिक संस्थानों में 12 फीसदी कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी रद्द कर दिया क्योंकि इंद्रा साहनी मामले की रोशनी में 50 फीसदी से आरक्षण ज्यादा नहीं हो सकता और महाराष्ट्र में पहले से ही करीब 52 फीसदी आरक्षण मौजूद है।
भाईसाब, मराठों को अपने राजनीतिक लाभ के लिए भड़काने वाली राजनीतिक पार्टियां यह कभी स्पष्ट नहीं करती कि महाराष्ट्र में 45 फीसदी से ज्यादा विधानसभा सीटें, 52 फीसदी से ज्यादा राज्यसत्ता में हिस्सेदारी, हमेशा मराठों की रही है। 1960 में महाराष्ट्र के गठन के बाद से अब तक 20 मुख्यमंत्री रहे हैं जिनमें 12 मुख्यमंत्री मराठा समुदाय से ही रहे हैं। मौजूदा एकनाथ सिंदे भी मराठा ही हैं। राज्य के विभिन्न संसाधनों में भी 33 फीसदी मराठों का 50 फीसदी से ज्यादा का कब्जा है। लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी मराठों को यह सब बताने और समझाने की कोशिश नहीं करती, जिसका नतीजा यह है कि ज्यादातर मराठा युवकों को लगता है कि उनकी समस्या का सारा कारण यह है कि उन्हें आरक्षण नहीं हासिल है। इसलिए वह अपनी सारी ताकत आरक्षण हासिल करने में लगाये हुए हैं।
भाईसाब, यह बताना जरूरी है कि महाराष्ट्र देश के उन गिने चुने राज्यों में है जहां उद्द्यमिता का शानदार वातावरण है। अगर विभिन्न सरकारों ने मराठा युवकों को आज की जरूरी कुशलताओं से लैस करने की उनमें भावना भरी होती तो आज महाराष्ट्र में करीब 4 करोड़ के आसपास विभिन्न तरह के रोजगारों में बड़ी तादाद में मराठा युवक होते, लेकिन ऐसा नहीं है। अगर बड़े पैमाने पर मराठा युवकों को टेक्निकल एजुकेशन दी गई होती, उसमें उन्हें दक्ष किया गया होता, तो न सिर्फ आज लाखों युवकों को विभिन्न तकनीकी रोजगार क्षेत्रों में नौकरियां मिली होतीं बल्कि राज्य के उद्योग जगत में उनकी बड़ी भूमिका होती।
आज महाराष्ट्र के विभिन्न प्राइवेट रोजगार क्षेत्रों में मराठा युवकों की भागीदारी अपनी जनसंख्या से बहुत कम है। क्योंकि ज्यादातर युवाओं ने अपनी ताकत सरकारी नौकरी पाने और उसमें भी आरक्षित नौकरी पाने में लगा रखी है। महाराष्ट्र देश में सबसे ज्यादा प्राइवेट इंजीनियर और डॉक्टर पैदा करता है लेकिन इनमें मराठा युवकों की तादाद उनके जनसांख्यिकीय अनुपात के मुकाबले में बहुत कम है। क्योंकि राज्य में राजनेताओं ने कभी इस समुदाय को आगे बढ़ने के लिए शिक्षा और तकनीकी कुशलताओं के महत्व को समझाया ही नहीं है।
आज यह समुदाय इस कदर हताशा में डूब गया है कि महज पिछले 7 दिनों में ही 6 युवकों ने सरेआम आत्महत्या करके अपना जीवन खत्म कर लिया। आरक्षण के आग में झुलसते महाराष्ट्र के भोले भाले युवाओं को बचाने के लिए और उन्हें हताश के इस चक्रव्यूह से निकालने के लिए राजनेताओं को ही नहीं बुद्धिजीवियों को भी आगे आना चाहिए।
आपको क्या लगता है ?…क्या वाकई में आरक्षण का लाभ जरूरतमंदों को मिल पा रहा या इस आरक्षण की मलाई को वो ही लोग चट कर रहे हैं जो आर्थिक रूप सबल हैं ?… भाईसाब…आशा करते हैं आपको यह जानकारी जरूर पसंद आई होगी, ऐसे ही ख़बरों के साथ जुड़े रहें भाईसाब के साथ… धन्यवाद!

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