Home Padhaku भारत के ‘ऑपरेशन शक्ति’ से हिल गई थी दुनिया : | ‘Pokhran-2 nuclear test’ |

भारत के ‘ऑपरेशन शक्ति’ से हिल गई थी दुनिया : | ‘Pokhran-2 nuclear test’ |

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भाईसाब…क्या आपकों पता है भारत का एक मिशन ऐसा भी था, जिसने अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों को चौंका दिया था। भारत के इस गुप्त ऑपरेशन से पूरी दुनिया हिल गई थी। अमेरिका ने निगरानी के लिए सैटेलाइट लगाए थे, लेकिन उसको इसकी भनक तक नहीं लगी। जी हां, हम बात कर रहे हैं वर्ष 1998 की जब तत्कालीन अटल सरकार ने राजस्थान के पोखरण में लगातार परमाणु धमाके कर पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। ‘ऑपरेशन शक्ति’ के तहत किए इन परीक्षणों के जरिए भारत ने अटल इरादों का परिचय देकर सशक्त भारत को और बुलंदी दी थी।…भाईसाब…आपको यह बताना जरूरी है कि अटल सरकार ने पोखरण-2 परीक्षण की समूची व्यूह रचना इतनी गुप्त रखी कि किसी को कानों-कान खबर नहीं लगी कि भारत इतना बड़ा कदम उठा रहा है। हालांकि विरोध स्वरूप अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों ने भारत पर सख्त पाबंदियां लगाई थी। इस दौरान सिर्फ इजराइल ने ही भारत का साथ दिया था….।
तो भाईसाब…आज के इस लेख में हम जानेंगे भारत द्वारा किये गये परमाणु धमाके की पूरी कहानी, जिसे पढ़कर आप दंग रह जाएंगे और अपने अंदर एक उत्साह और जोश महसूस करेंगे.. तो…तैयार हो जाइए..अपने अंदर देशभक्ति का अनूठा एहसास जगाने के लिए….।

– 11 मई 1998: इसी ऐतिहासिक दिन 3 परमाणु बमों का परीक्षण किया गया।
– 13 मई 1998: दो दिन के अंतर से 2 और टेस्ट किए गए।
– वैज्ञानिकों ने पहने थे फौज के कपड़े।
– मेजर जनरल पृथ्वीराज बन गये थे अब्दुल कलाम।
– रेगिस्तान के बालू में बड़े बड़े कुएं खोदे गए और वहां परमाणु बम रखे गए थे।
– परमाणु कार्यक्रम के ‘असली जनक’ थे पीवी नरसिंह राव।
– पोखरण-1 का नाम ‘बुद्ध स्माइलिंग’ रखा गया था।

भाईसाब…11 मई 1998 के दिन भारत ने वो कर दिखाया था, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। अटल बिहारी की सरकार ने राजस्थान के पोखरण में एक के बाद एक 3 परमाणु टेस्ट किए. अटल सरकार ने पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में खेतोलाई गांव 5 परमाणु परीक्षण किए थे। सफल परमाणु परीक्षण के बाद तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था ‘आज भारत ने पोखरण में भूमिगत परीक्षण किया।’ इस परीक्षण से भारत का सीना चौड़ा हो गया और वह घोषित रूप से परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया था। तब अटलजी ने नारा दिया था- ‘जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान।’ इसके बाद से 11 मई का दिन हर साल ‘नेशनल टेक्नोलॉजी डे’ के रूप में मनाया जाता है।
भाईसाब…आपके लिए ये जानना जरूरी है कि प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के 2 दिन बाद ही वाजपेयी ने एपीजे अब्दुल कलाम और एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन से मुलाकात की और कहा कि आप लोग परमाणु परीक्षण की तैयारी करें. तब तक वाजपेयी सरकार को विश्वास मत भी हासिल नहीं हुआ था. 28 मार्च 1998 को विश्वास मत हासिल करने के कुछ दिनों बाद 9 अप्रैल को वाजपेयी ने फिर एक बैठक बुलाई और कलाम से पूछा कि टेस्ट की पूरी तैयारी में आपको कितना वक्त लगेगा। उन्होंने जवाब दिया 30 दिन और इस तरह से उसी वक्त ‘ऑपरेशन शक्ति’ यानी परमाणु परीक्षण का वक्त तय हो गया। 11 मई और 13 मई 1998 को हुए 5 परमाणु परीक्षणों ने भारत को देखने का दुनिया का नजरिया ही बदल दिया. बेहद गुप्त तरीके से इस टेस्ट की तैयारी की गई थी। भारत के महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में भारत ने सफलतापूर्वक अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया था। खेतोलाई से 5 किमी दूर फायरिंग रेंज में एक के बाद एक तीन हुए परीक्षण हुए, जिससे पूरा इलाका गूंज उठा और आसमान की तरफ बादल का गुबार दिखा। इसी के साथ पूरे पोखरण इलाके में यह पता चल गया कि इस धरती ने भारत को परमाणु ताकतों वाले देशों की सूची में शामिल कर दिया है। भारत के परमाणु शक्ति बनने की खुशी और गर्व का पल पोखरण के लोगों के जेहन में आज भी वैसा ही है। उसके बाद 13 मई को न्यूक्लियर टेस्ट किए गए। परमाणु परीक्षण के बाद देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी खुद धमाके वाली जगह पर गए थे। भारत के इस ऐलान से पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई थी, क्योंकि किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी थी। भारत की इस सफलता पर अमेरिका के CIA ने भी माना कि भारत उन्हें चकमा देने में सफल रहा क्योंकि अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA भारत की हरकतों पर पल-पल नजर बनाए रखता था। सीआईए ने भारत की कड़ी पहरेदारी करने के लिए अरबों खर्च कर 4 सैटेलाइट लगाए थे। इन सब चुनौतियों के बावजूद भी भारत ने पोखरण की जमीन पर सफलतापूर्वक ऑपरेशन शक्ति को अंजाम दिया था। इस परमाणु परीक्षण-2 को गुप्त रखने की पीछे वजह यही थी कि अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश बने। दरअसल, साल 1995 में भी भारत ने परमाणु परीक्षण करने की योजना बनाई थी लेकिन अमेरिका नहीं चाहता था कि कोई उसकी बराबरी कर सके। साल 1995 में हो रहे परमाणु परीक्षण को अमेरिकी सैटेलाइट और खुफिया एजेंसी ने पूरी तरह से पानी फेर दिया था। भारत ने उस से सबक लिया, इसलिए दूसरे परीक्षण को एकदम गुप्त रखा गया था।
भाईसाब…आप ये जानकार चौंक जाएंगे कि इस परीक्षण के लिए देश के वैज्ञानिकों ने भी फौज के कपड़े तक पहने ताकि उन्हें सेटेलाइट से भी पहचाना नहीं जा सके। सभी वैज्ञानिकों को कोड नेम दिया गया। अब्दुल कलाम को मेजर जनरल पृथ्वीराज का नाम दिया गया था। भारत ने 11 मई को दोपहर बाद 3.45 मिनट पर तीन टेस्ट किए। ये 1998 के परमाणु परीक्षण का ही परिणाम है कि आज भारत ITER में भागीदार है और न्यूक्लियर प्रौद्योगिकी के मामले में हम दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं। भाईसाब…आपकी जानकारी के बता दें कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानता है। यही वजह है कि पोखरण को ही परमाणु परीक्षण करने के लिए चुना गया था। यहां पर आबादी बहुत दूरी पर थी। पोखरण जैसलमेर से 110 किलोमीटर दूर जैसलमेर-जोधपुर मार्ग पर स्थित एक कस्बा है। रेगिस्तान के बालू में बड़े बड़े कुएं खोदे गए और वहां परमाणु बम रखे गए थे। इन कुओं के ऊपर बालू के पहाड़ बना दिए गए थे।
भाईसाब..इस अभियान का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाता है। हालांकि एक कार्यक्रम के दौरान खुद वाजपेयी ने स्वीकार किया था कि इसकी भूमिका पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने तैयार की थी। उन्होंने खुलकर कहा था कि इसका पूरा श्रेय नरसिंह राव को जाता है। साल 2004 में नरसिंह राव के निधन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि राव इस परमाणु कार्यक्रम के ‘असली जनक’ थे। ‘राव ने मुझसे कहा था कि सामग्री तैयार है, मैंने तो केवल विस्फोट किया है।’ अटल ने यह भी कहा था कि अगर राव ज़िंदा होते तो वह आज भी इस रहस्य से पर्दा न उठाते क्योंकि उन्होंने खुद कहा था कि यह राज़, राज़ ही रहना चाहिए।
भाईसाब..आपको बताते है कि भारत विश्व में परमाणु क्रांति का अगुआ रहा है। डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने काफी पहले इसका अलख जगाया था, लेकिन उनके सपनों को षड्यंत्रों ने चूर कर दिया था। इसके बाद शक्ति स्वरूपा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 18 मई 1974 को पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण कराकर विश्व के परमाणु क्षमता संपन्न देशों की सूची में भारत का नाम दर्ज करा दिया था। पोखरण-1 का नाम ‘बुद्ध स्माइलिंग’ रखा गया था। इसके बाद 1995 में भारत ने और परीक्षण की कोशिश की, लेकिन विश्व समुदाय के कड़े तेवर से ये नहीं हो सके थे।
भाईसाब… वर्तमान समय में युद्ध का पारंपरिक स्वरूप बदल गया है। आज के युग में परमाणु बम शांति और सुरक्षा का एक सशक्त रक्षा कवच है। रूस-यूक्रेन युद्ध में परमाणु हथियार रखने वाले नाटो देश खुलेआम युद्ध में शामिल होने से इसलिए डर रहे हैं क्योंकि उन्हें इस बात का भय सता रहा है कि इससे परमाणु युद्ध शुरू हो जाएगा। आज जब पूरी दुनिया परमाणु ऊर्जा के साथ-साथ ऊर्जा के अन्य वैकल्पिक माध्यमों को अपनाने के लिए आगे बढ़ रही है तो स्वाधीनता के अमृत काल में भारत को भी वैकल्पिक ऊर्जा की राह पर चलने के साथ-साथ देश के परमाणु संयंत्रों का भी लगातार विकास करना होगा।
तो…भाईसाब..ये थी जानकारी हमारे एक महान मिशन के बारे में, आशा करते है यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही अन्य मिशन की जानकारी के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ…. धन्यवाद!

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