Home Mahanubhav मृत्यु के बाद भी जीवित रहने के किस्से छाये रहे : | Netaji Subhash Chandra Bose |

मृत्यु के बाद भी जीवित रहने के किस्से छाये रहे : | Netaji Subhash Chandra Bose |

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‘ऐसे सिपाही जो अपने देश के प्रति हमेशा वफादार रहते हैं और देश के लिए बलिदान देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, उन्हें कभी हराया नहीं जा सकता है।’…भाईसाब..आपको पता है ये जोश भरा कथन किसका है..! नहीं पता न…!चलिए हम बताते हैं…ये अनमोल सुविचार है महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुभाष चंद्र बोस का जिन्होंने ये भी कहा था, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’…ये कालजयी नारा आज भी जुनून और देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देता है।

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भाईसाहब आज के इस लेख में हम नेताजी के जीवन और उनके रहस्यमयी व्यक्तित्व के बारे में चर्चा करेंगे…।नेताजी के आदर्शों और उनके कार्यों की देश में इतनी चर्चा नहीं हुई जितनी कि उनकी रहस्यमय मृत्यु के बाद भी जीवित रहने के किस्सों की होती है। आखिर ऐसा क्या था, जिसकी वजह से नेताजी को इतना याद किया जाता है।

– साल 1942 में सुभाष चंद्र बोस हिटलर के पास गए और भारत को आजाद करने का प्रस्ताव रखा।
– जलियांवाला बाग हत्याकांड से सुभाष चंद्र बोस काफी विचलित हुए इसके बाद ही वे भारत की आजादी संग्राम में जुड़ गए।
– साल 1943 में बर्लिन में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद रेडियो और फ्री इंडिया सेंट्रल की स्थापना की।
– साल 1943 में ही आजाद हिंद बैंक ने 10 रुपए के सिक्के से लेकर 1 लाख रुपए के नोट जारी किए। एक लाख रुपए की नोट में नेताजी सुभाष चंद्र
जी की तस्वीर छपी थी।
– महात्मा गांधी को सुभाष चंद्र बोस ने ‘राष्ट्रपिता’ कह कर संबोधित किया था।
– उनको 1921 से 1941 के बीच में 11 बार देश के अलग-अलग जेल में कैद किया गया।
– सुभाष चंद्र बोस को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में दो बार अध्यक्ष के रूप में चुना गया था।
– उनकी मृत्यु की बात करें तो यह आज तक रहस्य बना है. क्योंकि आज तक उनकी मृत्यु से पर्दा नहीं उठ सका।

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भाईसाब..आपको ये बताना जरूरी है कि सुभाष चंद्र बोस बड़े रहस्यमय व्यक्ति भी थे। उनमें अपने जीवनकाल में एक संप्रभु भारत को देखने का उत्साह और जुनून था। वह स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेताओं में शुमार थे और ‘नेताजी’ कहलाए, मगर उनकी मृत्यु भी उतनी ही उलझन का विषय रही है। कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी थर्ड डिग्री बर्न के शिकार हो गए थे, जब उनका विमान ताइवान के ताइपे में उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जो उस समय जापान के कब्जे में था। रात 9 से 10 बजे के बीच निधन से पहले बोस कोमा में चले गए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में इंपीरियल जापानी सेना के जनरल सुनामासा शिदेई ने दावा किया कि जापान के आत्मसमर्पण के तुरंत बाद उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। शिदेई और बोस डेरेन के रास्ते में थे, जहां बोस को यूएसएसआर के वार्ताकारों के साथ राजनीतिक शरण के बारे में बात करनी थी और भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखने के लिए आजाद हिंद फौज का नियंत्रण सोवियत संघ को सौंपना था। घायल या मृत बोस की कोई तस्वीर नहीं ली गई और न ही मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया गया। इन्हीं वजहों से आजाद हिंद फौज ने यह मानने से इनकार कर दिया कि उनका निधन हो गया। बोस के कई समर्थकों ने उनके निधन के समाचार और परिस्थितियों, दोनों पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। इसे साजिश बताते हुए कहा गया कि बोस के निधन के कुछ घंटों के भीतर कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई थी। नेताजी के बारे में कुछ मिथक आज भी कायम हैं। बोस के चीफ ऑफ स्टाफ कर्नल हबीब उर रहमान, जो उस दुर्भाग्यपूर्ण उड़ान में उनके साथ थे, बच गए। उन्होंने एक दशक बाद बोस के निधन पर गठित एक जांच आयोग में गवाही दी। कहा जाता है कि बोस की अस्थियां टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हुई हैं।
भाईसाब…विमान हादसे के बाद भी लंबे समय तक उनके जिंदा रहने की अफवाहें रह-रहकर उड़ती रहीं।1940 के बाद से, जब वह कलकत्ता में हाउस अरेस्ट से बच गए थे तो उनके ठिकाने के बारे में अफवाहें बढ़ीं। 1941 में जब वह जर्मनी में दिखाई दिए, तो उनके और उनकी व्यस्तताओं के बारे में तरह-तरह की अटकलें रहीं। उनको लेकर अटकलों और रहस्यों का सिलसिला विमान हादसे के बाद भी जारी रहा। सन 1950 के दशक में कहानियां सामने आने लगीं कि बोस तपस्वी बन गए थे। इतिहासकार लियोनार्ड ए. गॉर्डन ने 1960 के दशक में इसे ‘मिथक’ बताया था। हालांकि बोस के कुछ सहयोगियों ने ‘सुभाषवादी जनता’ का गठन किया, जो इस कथा को बढ़ावा देने वाला एक संगठन था कि बोस उत्तर बंगाल के शौलमारी स्थित एक अभयारण्य में चले गए थे। कुछ रिपोर्ट स्पष्ट रूप से नेताजी की मृत्यु को स्थापित करती हैं। कहा गया कि मित्सुबिशी के-21 बमवर्षक विमान, जिस पर वह सवार थे, ताइपे में उड़ान भरने के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
भाईसाब…भारत सरकार ने भी अब तक नेताजी की मृत्यु या लापता होने की तीन जांच कराई हैं। केवल पहले दो ने निष्कर्ष निकाला कि 18 अगस्त, 1945 को उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद ताइहोकू के एक सैन्य अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई, और यह भी कि टोक्यो में रेंकोजी मंदिर में नश्वर अवशेष उनके हैं। एक खुफिया अधिकारी कर्नल जॉन फिगेस को बोस की मौत की जांच करने का काम सौंपा गया था। 5 जुलाई, 1946 को प्रस्तुत फिगेस की रिपोर्ट गोपनीय थी। लेकिन फिगेस की रिपोर्ट की पुष्टि करती है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू हवाईअड्डे के पास एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस सवार थे, बोस का उसी दिन पास के सैन्य अस्पताल में निधन हो गया। ताइहोकू में उनका अंतिम संस्कार किया गया और उसकी राख को टोक्यो भेज दिया गया।
भाईसाब…ये बात ध्यान रखना जरूरी है कि बोस के बारे में अफवाहों और विमान दुर्घटना की घटना पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से, 1956 में भारत की संप्रभु सरकार ने शाहनवाज खान की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की, जो उस समय संसद सदस्य थे। वह आजाद हिंद फौज में पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल थे। इस समिति के अन्य अहम सदस्यों में एस एन मैत्रा, पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से नामित एक सिविल सेवक और नेताजी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस थे। इस समिति को ‘नेताजी जांच समिति’ भी कहा जाता है। अप्रैल से जुलाई 1956 के बीच, इस समिति ने भारत, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में 67 गवाहों का बयान लिया, विशेष रूप से वे जो उस विमान दुर्घटना में बच गए थे और दुर्घटना से उनकी चोटों के निशान थे। निष्कर्ष निकाला गया कि बोस की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू में विमान दुर्घटना में हुई थी। वहीं सुरेश चंद्र बोस ने अंतिम रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और यह दावा करते हुए असहमति का एक नोट लिखा कि शाहनवाज समिति के अन्य सदस्यों और कर्मचारियों ने जानबूझकर कुछ महत्वपूर्ण सबूतों को रोक दिया था और यह कि समिति को नेहरू द्वारा विमान दुर्घटना से मृत्यु का अनुमान लगाने के लिए निर्देशित किया गया था। सुरेश चंद्र बोस ने निष्कर्ष निकाला कि कोई दुर्घटना नहीं हुई थी, और उनके भाई अभी जीवित थे।
भाईसाब…नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशान के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकीनाथ बोस मशहूर वकील थे तथा उनकी माता प्रभावती देवी एक कुशल गृहणी थीं, कुल 14 भाई बहनों में ये 9वीं संतान थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दिक्षा कटक में ही हुई थी, आगे इन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से 1918 में बीए की पढ़ाई पूरी की। इसके पश्चात इन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास कर के अपने अद्वितीय प्रतिभा का परिचय दिया।
भाईसाब..आपको बता दें कि देशभर में उनके जन्मदिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है। बचपन से ही तेज बुद्धि के धनी नेताजी ने न सिर्फ क्रैंब्रिज यूनिवर्सिटी से सिविल परीक्षा पास की थी, बल्कि वह इंग्लैंड में प्रशासनिक सेवा की प्रतिष्ठित नौकरी भी कर रहे थे। लेकिन इस दौरान भारत में अंग्रेजों द्वारा हो रहे अत्याचारों से दुखी होकर वह अपनी नौकरी छोड़कर देश की आजादी की मुहिम में लग गए थे। साल 1920 के अंत में उन्होंने कम उम्र में ही जवाहरलाल नेहरू का अनुसरण करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की यूथ विंग का नितृत्व किया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस 1938 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। हालांकि, बाद में भतभेदों के कारण सुभाष चंद्र बोस का कांग्रेस से रास्ता अलग हो गया और उन्होंने एक नई पार्टी बनाने की घोषणा की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस: ‘देशभक्तों के बीच प्रिंस’के नाम से जाने जाते थे। नेताजी का मानस स्वामी विवेकानंद और श्री रामकृष्ण परमहंस से काफी प्रभावित था। इस महान स्वतंत्रता सेनानी को 1921 से 1941 की अवधि के दौरान 11 बार कैद किया गया था। जेल में रहते हुए उन्होंने 1930 में कलकत्ता के मेयर का पद ग्रहण किया था। साल 1942 में सुभाष चंद्र बोस हिटलर के पास गए और भारत को आजाद करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन हिटलर ने भारत की आजाद में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और उसने सुभाष चंद्र बोस को कोई भी स्पष्ट वचन भी नहीं दिया।
भाईसाब..क्या आपको पता है नेताजी ने प्रेम विवाह किया था। उनकी प्रेम कहानी बड़ी दिलचस्प थी। 1934 में सुभाष चन्द्र बोस ऑस्ट्रिया में अपना इलाज करा रहे थे। उस समय उन्होंने सोचा कि अपनी जीवनी लिखी जाए। इसके लिए उन्हें टाइपिस्ट की जरूरत थी। उनके ऑस्ट्रिया के एक फ्रेंड ने एमिली शेंकल को अप्वाइंट करा दिया। सुभाष एमिली को अपनी जीवनी डिक्टेट कराते थे। इसी दौरान दोनों में प्यार हो गया। 1937 में दोनों ने शादी कर ली। 29 नवंबर 1942 को विएना में एमिली ने एक बेटी को जन्म दिया। सुभाष ने अपनी बेटी का नाम अनीता बोस रखा।…
भाईसाब…भले नेताजी की मृत्यु आज भी रहस्यमयी बनी हुई है लेकिन एक बात बहुत ही खास है, नेताजी बोस से पीढ़ियां प्रेरित होते आई हैं। उनकी कही बातें और उनके दिए नारे करोड़ों भारतीयों को प्ररणा देते हैं। भाईसाब…आशा करते हैं यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही अन्य महानुभाव की जानकारी के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ, धन्यवाद…!

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