Home Latest इमेज ब्रांडिंग में कौन आगे ? | Narendra Modi – Rahul Gandhi |

इमेज ब्रांडिंग में कौन आगे ? | Narendra Modi – Rahul Gandhi |

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भाईसाब…आगामी लोकसभा चुनाव-2024 देश के लिए काफी अहम माना जा रहा है। इस चुनाव में देश और दुनिया की खास नजर दो चेहरों पर रहेगी…, क्योंकि इन दोनों चेहरों ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी-अपनी इमेज ब्रांडिंग जबरदस्त तरीके से की है…। भाईसाब..क्या आप जानते ये दोनों चेहरे है कौन…! चलिए हम बताते हैं…इन चेहरों का नाम है नरेंद्र मोदी जो देश के प्रधानमंत्री और दूसरे हैं कांग्रेस के दिग्गज नेता राहुल गांधी जो हाल ही में ‘जननायक’ के रूप में उभरे हैं…।

तो भाईसाब…आज के इस लेख में हम देश के दो दिग्गज नेताओं के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालेंगे…। इस लेख के माध्यम से आपको भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के दिग्गज नेता राहुल गांधी के बारे में बताएंगे और दोनों चेहरों का इस लेख के जरिये तुलनात्मक अध्ययन करेंगे..।
भाईसाब…एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिनकी एक खास छवि है। प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ उनका एक राजनीतिक पक्ष और चेहरा है। मोदी की एक पॉलिटिकल अप्रोच और एक पॉलिटिकल स्टाइल है। वे इस दायरे के बाहर निकलने की बहुत ज्यादा कोशिश नहीं करते हैं। वे न तो ज्यादा लोगों से मिलते हैं और न ही मीडिया में इंटरव्यू देते हैं। वे बहुत ही कम मौकों पर आम लोगों से मेल-मुलाकात करते हैं या उनके साथ बैठते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री की सुरक्षा और उनके प्रोटोकाल के तहत नरेंद्र मोदी के लिए यह सब करना इतना आसान भी नहीं। तो भाईसाब…दूसरी तरफ विपक्ष के सबसे सादे चेहरे के तौर पर राहुल गांधी हैं। वे खासतौर से लोगों के बीच जाते हैं, उनसे मिलते हैं और अक्सर वे वैसा बन जाते हैं जिस तरह के लोगों से वे मिलते हैं। हाल ही में राहुल गांधी आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर कुली बनकर पहुंच गए। कुली भी उनको देखकर हैरान रह गए। जैसे ही यह तस्वीर वायरल हुई कांग्रेस पार्टी ने अपने ट्विटर हैंडल से राहुल गांधी को ‘जननायक’ घोषित कर दिया। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है, जब राहुल ने अपना अवतार बदला हो। इसके पहले वे ट्रक भी चला चुके हैं। खेतों में किसानों के साथ धान रोप चुके हैं, बाइक मैकेनिक से इंजन सुधारने के गुर सीख चुके हैं और लद्दाख में बाइक राइडिंग भी कर चुके हैं।
भाईसाब…आपकों ये जरूर बताना चाहूंगा कि ये खास बनाम आम आदमी की जंग है…। राहुल गांधी के ये चेहरे ठीक मोदी की छवि के विपरीत है। पिछले दिनों सुबह- सुबह अचानक दिल्ली की आजादपुर मंडी पहुंचे। यहां उन्होंने सब्जी-फल बेचने वालों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनी। राहुल गांधी लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि वो देश के उस तबके के साथ जुड़े हुए हैं या उनका दर्द महसूस करने के लिए पहुंचते हैं, जिन्हें समाज ने हाशिए पर छोड़ रखा है। फिर चाहे वो ट्रक ड्राइवर हो, किसान या कुली।
भाईसाब…हालांकि अपने सियासी दौर में मोदी ने भी खुद को रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले के तौर पर स्थापित किया था, लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो सिर्फ मोदी ही जानते हैं, क्योंकि कोई दूसरा मोदी के इस किस्से का गवाह नहीं है। न ही उस दौर में कैमरे और सोशल मीडिया जैसी कोई चीज थी, जबकि दूसरी तरफ राहुल गांधी का यह आम कनेक्शन उस दौर में हो रहा है, जहां मोबाइल और सोशल मीडिया का बोलबाला है। स्पष्ट है, यह राहुल का राजनीतिक स्टंट है जिसमें वे ये स्थापित करना चाहते हैं कि वे आम आदमी और उसके दर्द को बेहद करीब से महसूस करते हैं। इसे राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के आगे के हिस्से के तौर पर भी देख लिया जाना चाहिए। जब राहुल इस यात्रा में थे तो कई लोगों से मेल मुलाकात करते और बातचीत करते थे। अब चूंकि यात्रा खत्म हो गई है तो राहुल तरह-तरह के क्षेत्र के लोगों से मिलकर इसे पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। जहां तक इसके राजनीतिक मायनों की बात है तो संभव है कि वे नरेंद्र मोदी की छवि के ठीक उलट अपनी एक सुलभ उपलब्ध छवि गढ़ना चाहते हैं, वे पीएम मोदी द्वारा की गई सारी चीजों के उलट करना चाहते हैं।
भाईसाब…हालांकि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी जमनी-आसमान फर्क है…हाल ही में हुए एक वाक्ये से इसे समझा जा सकता है। हाल ही में भ्रष्टाचार के एक मामले में ED ने राहुल गांधी को पूछताछ के लिए बुलाया है। राहुल गांधी ने कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं, पदाधिकारियों, लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों को उस दिन पूछताछ के दौरान एक जुलूस निकालने के लिए दिल्ली बुलाया है. यानी राहुल गांधी अपने साथ सैकड़ों नेताओं और हजारों कार्यकर्ताओं को लेकर गये. ये सब करके गांधी परिवार देश को जांच एजेंसियों को ये बताना चाहता है कि देश के कानून उन पर लागू नहीं होते. वो एक ऐसे राजपरिवार की तरह हैं, जिसकी गर्दन तक कानून के लम्बे हाथ भी नहीं पहुंच सकते। वहीं दूसरी तरफ साल 2010 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन्हें गुजरात दंगों से जुड़े एक मामले की पूछताछ के लिए गांधीनगर बुलाया गया था तो वह पूछताछ के लिए अकेले SIT के दफ्तर गए थे और 9 घंटे की इस गहन पूछताछ में उनसे 100 से ज़्यादा सवाल पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे राजनीतिक उत्सव नहीं बनाया।
भाईसाब…दोनों नेताओं में कई अंतर है…। एक तरफ मोदी भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। वह अपने व्यापक अनुभव, कुशल वक्तव्य और नीति निर्धारण क्षमता के लिए जाने जाते हैं। वह एक सशक्त नेता हैं जो देश में विकास और उन्नति के लिए कई नए पहल करते हैं। दूसरी ओर, राहुल गांधी एक युवा नेता हैं जो अपनी पार्टी के नेतृत्व में हैं। वह ज्यादातर विषयों पर अपनी पार्टी के राजनीतिक स्टैंड पर खड़े होते हैं और उनके विचारों पर कई बार बहस होती है। वह अक्सर अपनी पार्टी के लिए जगह-जगह चुनाव अभियानों में शामिल होते हैं।
भाईसाब..क्या आपको पता है राहुल गांधी की इमेज ब्रांडिंग के पीछे एक विदेशी महिला का हाथ है। आपको याद होगा, एक प्रेसवार्ता में राहुल गांधी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा था राहुल गांधी आपके दिमाग में है मैंने मार दिया उसको। जिस व्यक्ति को आप देख रहे हैं वो राहुल गांधी नहीं है। इमेज में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है, जो इमेज रखना चाहते हैं रख लो। दरअसल, राहुल की इस नई इमेज के पीछे एक अमेरिकी महिला की सलाह बताई जाती है। इस महिला का नाम स्टेफनी कटर हैं। स्टेफनी एक अमेरिकन पॉलिटिकल कंसलटेंट हैं। साल 2012 में स्टेफनी बराक ओबामा की डिप्टी कैंपेन मैनेजर थीं। उस दौरान वो भारत यात्रा पर थी। यात्रा के दरमियां उनकी मुलाकात राहुल गांधी से हुई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक स्टेफनी ने तब राहुल को अपने सोशल मीडिया कैंपेन पर जोर देने के लिए कहा था। एक खबर यह भी आई थी कि साल 2021 में राहुल गांधी और स्टेफनी कटर की फिर से मुलाकात हुई थी।
भाईसाब…हाल ही में लोकप्रियता को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच एक और जुबानी जंग छिड़ गई है। दोनों पार्टियां अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सोशल मीडिया एंगेजमेंट के आधार पर उनकी लोकप्रियता की तुलना करने लगी. कांग्रेस ने संसद टीवी के यूट्यूब चैनल पर दर्शकों की संख्या दिखाने वाले स्क्रीनशॉट साझा किए, जिसमें दावा किया गया कि संसद में राहुल गांधी के भाषण को पीएम मोदी की तुलना में अधिक दर्शक मिले। कांग्रेस के अनुसार, राहुल गांधी के भाषण को संसद टीवी पर 3.5 लाख बार देखा गया, जबकि मोदी को 2.3 लाख बार देखा गया। वहीं बीजेपी का कहना है कि ट्विटर पर पीएम मोदी के अकाउंट को पिछले एक महीने में लगभग 79.9 लाख एंगेजमेंट मिले, जबकि राहुल गांधी के अकाउंट को लगभग 23.43 लाख एंगेजमेंट मिले। बीजेपी ने कहा कि फेसबुक पर, पीएम मोदी के अकाउंट को पिछले एक महीने में लगभग 57.89 लाख एंगेजमेंट मिले, जबकि राहुल गांधी के अकाउंट को लगभग 28.38 लाख एंगेजमेंट मिले। बीजेपी ने प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के यूट्यूब चैनलों से प्राप्त व्यूअरशिप की संख्या भी साझा की। इन आंकड़ों में भी मोदी आगे दिख रहे हैं।
भाईसाब…यह भा जान लें कि राहुल को सलाह दी गई थी कि वे अपनी इमेज की परवाह न करे और सभी को खुश करने की कोशिश न करे। इसके साथ ही उन्हें यह भी सलाह दी गई थी कि पीएम नरेंद्र मोदी का अपना एक तर्क है। उनकी वैश्विक छवि है। इसलिए राहुल उनके ठीक उलट और लोकल छवि को स्थापित करे। राहुल ने अपनी इमेज बदलने की कोशिश की और बहुत हद तक सफल भी हुए. उन्होंने कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोडो यात्रा की और भारत जोड़ो यात्रा में कई लोगों से मिले कई इंटरव्यू किए। इस यात्रा के बाद ट्रक ड्राइवरों के साथ सफर कर चर्चा की और खेत में किसानों के साथ धान भी बोया। इसके अलावा बाइक मैकेनिक के साथ बैठकर बाइक सुधारने का काम किया और फिर रेलवे स्टेशन पर सामान उठाकर कुली बन गए।
तो भाईसाब…साल 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे। पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए यह सत्ता बचाने का रण होगा तो वहीं राहुल गांधी और उनके साथ नजर आ रहे इंडिया गठबंधन के सामने मोदी सरकार को सत्ता से हटाने की चुनौती होगी। तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी अपनी-अपनी इमेज के सहारे राजनीति कर रहे हैं। लेकिन यह छवि उन्हें राजनीति तौर पर कितना फायदा या नुकसान पहुंचाएगी, ये तो 2024 के चुनावों के परिणामों से ही स्पष्ट हो सकेगा। मोदी जैसे ताकतवर नेता के सामने राहुल की नई इमेज कितनी कारगर होगी, वो भी तब जब भाजपा अपने सबसे ताकतवर दौर में है, जबकि कांग्रेस अपने सबसे कमजोर दौर में जूझ रही है।
तो भाईसाब..हम आपसे पूछना चाहते हैं कि आखिर इसके पीछे की राजनीति क्या है। क्या राहुल गांधी, नरंद्र मोदी के ठीक खिलाफ एक बेहद सुलभ छवि गढ़ना चाहते हैं या इसके पीछे की कोई अलग किस्म की राजनीति है। जाहिर है, ये है तो राजनीति का ही हिस्सा, लेकिन मोदी की पॉलिटिकल मैनेजमेंट वाली छवि के विपरीत राहुल की यह आम चेहरे वाली राजनीति कितनी कारगर या सफल होगी यह तो वक्त ही बताएगा। क्या राहुल गांधी देश की राजनीति को खास बनाम आम आदमी की जंग बनाना चाहते हैं ?। ये सवाल हम आरके छोड़े जा रहे हैं…भाईसाब..आशा करते है यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, धन्यवाद!

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