Home Mahanubhav एक महान साहित्यिक : मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand |

एक महान साहित्यिक : मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand |

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यह बात है सन 1880 की, जब भारत अपनी जी-जान लगाकर आज़ादी के लिए लड़ रहा था| और इस जंग में ऐसे कई स्वतंत्रता सैनानी रहे जिन्होंने अपनी आवाज़ और अपनी क़ुरबानी से इस देश को गोरो से आज़ाद करवाया| लेकिन कुछ ऐसे महारथी भी थे जिन्होंनेअपनी कलम को अपना आवाज़ बनाया।

मुंशी प्रेमचंद।

नमस्कार भाईसाब! आइये जानते है मुंशी जी के जीवन के बारे में।

जन्मकथा:
प्रेमचंद का जन्म वाराणसी से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गांव में 31 जुलाई, 1880 को हुआ। प्रेमचंद के पिताजी का नाम मुंशी अजायब लाल और माताजी का नाम आनंदी देवी था।प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था। और यह नाम उन्होंने कई वर्षो बाद अपनाया था। इससे पहले वे नवाब राय के उपनाम से पहचाने जाते थे| वास्तव में इनका नाम ‘धनपत राय’ था।गरीबी से लड़ते हुए उन्होंने अपनी मेट्रिक पढाई पूरी की। वह पढाई-लिखाई में थोड़े कमज़ोर भी थे जिसके किस्से उनकी पहली किताब ”mockery” में लिखे गए थे।प्रेमचंद केवल 15 साल के थे, जब उनकी शादी शिवरानी देवी से हुई।प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराईच में सहायक शिक्षक के रूप में नौकरी हासिल की, जहाँ वे महीने के 20 रुपये कमाते थे।
प्रेमचंद को अगस्त 1916 में ट्रांसफर पर गोरखपुर में तबादला कर दिया गया। वह राजकीय दीक्षा विद्यालय, गोरखपुर में सहायक मास्टर बन गये।
स्वतंत्रता में उनके साहित्यिक कार्य का योगदान:
सन 1920 में, गोरखपुर में हुए, गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के भाषण ने प्रेमचंद पर ऐसा प्रभाव डाला, जिससे उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया|अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद, प्रेमचंद 18 मार्च 1921 को गोरखपुर छोड़कर बनारस चले गए और अपने साहित्यिक करियर पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया।उन्होंने 1923 में बनारस में एक प्रिंटिंग प्रेस और प्रकाशन गृह की स्थापना की, जिसका नाम सरस्वती प्रेस रखा गया।
एकता और भाईचारे के सच्चे समर्थक, प्रेमचंद ने मूल लोगों की आकांक्षाओं को व्यक्त करके बड़े पैमाने पर स्वतंत्रता आंदोलन को बढ़ावा दिया।
उनके उपन्यास निर्मला, भारत में दहेज प्रथा से संबंधित हैं, प्रतिज्ञा विधवा पुनर्विवाह के विषय से संबंधित है, और गबन, मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित है।’उपन्यास सम्राट’ के रूप में भी जाने जाने वाले प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू पाठकों के बीच भारी लोकप्रियता रही है और इनके पाठको ने ही इनको मुंशी की उपाधि दी है ।
प्रेमचंद साहित्य संस्थान, गोरखपुर:
प्रेमचंद ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गोरखपुर में बिताया था| यहीं उनकी मुलाकात शायर फ़िराक़ गोरखपुरी से हुई।
अपने सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास, हुस्न-ए-बाज़ार, की रचना उन्होंने यही रहकर की थी।
राजकीय दीक्षा विद्यालय, गोरखपुर का वह विद्यालय है जहाँ उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने अपनी पहली नौकरी की थी।
प्रेमचंद को सम्मानित करते हुए इस विद्यालय ने उनके कमरे को प्रेमचंद साहित्य संस्थान में परिवर्तित कर दिया है।
बेतियाहाता मोहल्ले में, नॉर्मल स्कूल के पास जिस घर में वह रहते थे, वह एक पार्क से घिरा हुआ है। वर्तमान में यह भवन प्रेमचंद साहित्य संस्था का आधार है।घर के पीछे ईदगाह है। ऐसा माना जाता है कि प्रेमचंद की इसी नाम की क्लासिक लघु कहानी इसी ईदगाह से प्रेरित थी।
वर्ष 2000 में प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने “दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद” विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित कीया था। उत्तर प्रदेश में इस विषय पर केन्द्रित यह पहला आयोजन था। कंवल भारती, मोहनदास नैमिशराय और श्योराज सिंह सहित उस समय के लगभग सभी दलित लेखकों ने भाग लिया था।8 अक्टूबर, 1936 को पेट के रोग से उनका निधन हुआ। अपने छोटे से जीवन में, उन्होंने किसानों, विधवाओं, वेश्याओं जैसे प्रसंगो पर मौजूद लोगों के हितों की वकालत करते हुए हिंदी और उर्दू में 14 से अधिक उपन्यास और 300 छोटी कहानियाँ लिखीं। हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसे महानुभाव का जन्म न कभी हुआ है, और ना कभी होगा।

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धन्यवाद!

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