Home Mahanubhav राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी । Mahatma Gandhi |

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी । Mahatma Gandhi |

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आज हम जानेंगे , दुनिया के ऐसे राजनितिक और आध्यात्मिक नेता महात्मा गाँधीजी के बारे में,
अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि, ‘न सिर्फ अमरीका को वरन पुरी दुनिया को इस नेता के सिद्धांतो और पद चिन्हो पर चलने की जरुरत है’। गांधी जी ने अपना जीवन सत्य की खोज में समर्पित कर दिया। उन्होंने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी स्वयं की गल्तियों का प्रयोग खुद पर करते हुए सीखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आत्मकथा को सत्य के प्रयोग का नाम दिया।एक बार वायसराय लार्ड कर्जेन ने कहा था कि सत्य की कल्पना भारत में यूरोप से आई है। इस पर गांधी जी बड़े ही क्षुब्ध हुए और उन्होंने वायसराय को लिखा, “आपका विचार गलत है। भारत में सत्य की प्रतिष्ठा बहुत प्राचीन काल से चली आ रही है। सत्य परमात्मा का रूप माना जाता है और भारत में सत्य ही भगवान है ।

हालांकि गांधी जी अहिंसा के सिद्धांत के जनक तो नहीं थे फिर भी इसे बड़े पैमाने पर राजनैतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। अहिंसा के इस छाप को गाँधी जी ने उस वक़्त दुनिया पर छोड़ा जब सरकारें पुलिस और कही न कहीं जनता भी हिंसा की आग में जल रहे थे गाँधी जी का कहना था आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अँधा बना देगी वहीँ एक वक्तव्य में उन्होंने कहा था मरने के लिए मैरे पास बहुत से कारण है लेकिन मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है । बाल्यावस्था में गांधी को मांस खाने का अनुभव मिला जिसमे उनके एक शेख मेहताब का भी योगदान था। और जैसे जैसे उम्र बढ़ी वो मांसाहार से दूर होते चले गए और एक समय पर मांसाहार के लिए उनका ये कहना था कि शाकाहारी भोजन न केवल शरीर की जरूरतों को पूरा करता है बल्कि यह आर्थिक प्रयोजन की भी पूर्ति करता है किउ की गरीबी के उस दौर में मांस महंगे मिलते थे और मांस के महंगा होने का एक कारन यह भी था की हिन्दू और जैन धर्म में मांस खाना वर्जित है .गाँधी जी बहुत देर तक खाने से परहेज रखते थे , और राजनैतिक विरोध के रूप में इस परहेज का बेहतर इस्तेमाल करते थे कई बार ब्रिटिश सरकार के खिलाफ इस परहेज को अपनाया वही उन्होंने अपने आत्मकथा में लिखा है कि शाकाहारी होना ब्रह्मचर्य के प्रति प्रतिबद्ध होने की शुरूआती सीढ़ी है। गाँधी जी के लिए, ब्रह्मचर्य का अर्थ था “इन्द्रियों के अंतर्गत विचारों, शब्द और कर्म पर नियंत्रण, ब्रम्हचर्य के प्रति उनका झुकाव बचपन से था परन्तु अपने पिता की बीमारी से मौत का दोष उन्होंने खुद के ब्रम्हचर्य को ना पालन करने का वजह माना और विवाहित होने के बावजूद ३६ साल की उम्र में ब्रम्हचर्य को स्वीकार कर लिया। गाँधी जी हमेशा ख़ुद को शुन्य के स्थिति में पाना चाहते थे जिस से अनावश्यक खर्च, साधारण जीवन शैली और जीवन की सार्थकता को अपनाया जा सके। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के पश्चात् उन्होंने पश्चमी शैली के वस्त्रों का त्याग किया। उन्होंने भारत के सबसे गरीब इंसान के द्वारा जो वस्त्र पहने जाते हैं उसे स्वीकार किया, तथा घर में बने हुए खादी कपड़ो को पहनने की वकालत भी की।और इसी सादगी ने भारत के स्वाभिमान को जागृत किया और हर घर ने चरखा से सूत क़ात कर वस्त्र बनाने का निश्च्य लिया और वही चरखा बाद में भारत के राष्ट्रीय ध्वज में सादगी का प्रतिक बना ।
गाँधी जी का मानना था कि प्रत्येक धर्म के मूल में सत्य और प्रेम होता है। उनका कहना है कि ‘कुरान’, ‘बाइबिल’, ‘जेन्द-अवेस्ता’, ‘तालमुड’, अथवा ‘गीता’ किसी भी माध्यम से देखिए, हम सबका ईश्वर एक ही है, और वह सत्य तथा प्रेम स्वरूप है। ढोंग, कुप्रथा आदि पर भी उन्होंने सभी धर्मो के सिद्धान्तों के प्रति सवालिया रुख अख्तियार किया। वे एक अथक धार्मिक समाज सुधारक थे। और छुआछूत जात पात के सख्त विरोधी थे। गाँधी जी के कार्यशैली और जीवन से कई नेताओ ने प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न किया उनमे से कुछ नाम अगर मई आपको बताऊ तो सबसे प्रमुख थे नेल्सन मंडेला, खान अब्दुल गफ्फार खान, अंग सान सु की आदि वैसे गाँधी जी एक प्रेरणाप्रद इंसान थे और इनके जीवन के मूल्यों से हम सभी को सीखना चाहिए और उनकी लिखी हर किताब हमे पढ़नी चाहिए और उनमे से हिन्द स्वराज और सत्य के प्रयोग तो हर व्यक्ति को जरूर पढ़ना चाहिए।
महात्मा गाँधीजी के जयंती के अवसर पर आप सभी को बहोत बहोत शुभकामनाये।
दुनिया के ऐसे राजनितिक और आध्यात्मिक नेता जिनके बारे में अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि, न सिर्फ अमरीका को वरन पुरी दुनिया को इस नेता के सिद्धांतो और पद चिन्हो पर चलने की जरुरत है।
नमस्कार भाई साब, गाँधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आज हम महात्मा गाँधी जी के सिद्धांतो के बारे में बात करेंगे जिन से हम अपने जीवन में प्रेरणा ले सकें । गांधी जी ने अपना जीवन सत्य की खोज में समर्पित कर दिया। उन्होंने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी स्वयं की गल्तियों का प्रयोग खुद पर करते हुए सीखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आत्मकथा को सत्य के प्रयोग का नाम दिया।
एक बार वायसराय लार्ड कर्जेन ने कहा था कि सत्य की कल्पना भारत में यूरोप से आई है। इस पर गांधी जी बड़े ही क्षुब्ध हुए और उन्होंने वायसराय को लिखा, “आपका विचार गलत है। भारत में सत्य की प्रतिष्ठा बहुत प्राचीन काल से चली आ रही है। सत्य परमात्मा का रूप माना जाता है और भारत में सत्य ही भगवान है । हालांकि गांधी जी अहिंसा के सिद्धांत के जनक तो नहीं थे फिर भी इसे बड़े पैमाने पर राजनैतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। अहिंसा के इस छाप को गाँधी जी ने उस वक़्त दुनिया पर छोड़ा जब सरकारें पुलिस और कही न कहीं जनता भी हिंसा की आग में जल रहे थे गाँधी जी का कहना था आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अँधा बना देगी वहीँ एक वक्तव्य में उन्होंने कहा था मरने के लिए मैरे पास बहुत से कारण है लेकिन मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है । बाल्यावस्था में गांधी को मांस खाने का अनुभव मिला जिसमे उनके एक शेख मेहताब का भी योगदान था। और जैसे जैसे उम्र बढ़ी वो मांसाहार से दूर होते चले गए और एक समय पर मांसाहार के लिए उनका ये कहना था कि शाकाहारी भोजन न केवल शरीर की जरूरतों को पूरा करता है बल्कि यह आर्थिक प्रयोजन की भी पूर्ति करता है किउ की गरीबी के उस दौर में मांस महंगे मिलते थे और मांस के महंगा होने का एक कारन यह भी था की हिन्दू और जैन धर्म में मांस खाना वर्जित है .गाँधी जी बहुत देर तक खाने से परहेज रखते थे , और राजनैतिक विरोध के रूप में इस परहेज का बेहतर इस्तेमाल करते थे कई बार ब्रिटिश सरकार के खिलाफ इस परहेज को अपनाया वही उन्होंने अपने आत्मकथा में लिखा है कि शाकाहारी होना ब्रह्मचर्य के प्रति प्रतिबद्ध होने की शुरूआती सीढ़ी है । गाँधी जी के लिए, ब्रह्मचर्य का अर्थ था “इन्द्रियों के अंतर्गत विचारों, शब्द और कर्म पर नियंत्रण, ब्रम्हचर्य के प्रति उनका झुकाव बचपन से था परन्तु अपने पिता की बीमारी से मौत का दोष उन्होंने खुद के ब्रम्हचर्य को ना पालन करने का वजह माना और विवाहित होने के बावजूद ३६ साल की उम्र में ब्रम्हचर्य को स्वीकार कर लिया ।
गाँधी जी हमेशा ख़ुद को शुन्य के स्थिति में पाना चाहते थे जिस से अनावश्यक खर्च, साधारण जीवन शैली और जीवन की सार्थकता को अपनाया जा सके । दक्षिण अफ्रीका से लौटने के पश्चात् उन्होंने पश्चमी शैली के वस्त्रों का त्याग किया। उन्होंने भारत के सबसे गरीब इंसान के द्वारा जो वस्त्र पहने जाते हैं उसे स्वीकार किया, तथा घर में बने हुए खादी कपड़ो को पहनने की वकालत भी की।
और इसी सादगी ने भारत के स्वाभिमान को जागृत किया और हर घर ने चरखा से सूत क़ात कर वस्त्र बनाने का निश्च्य लिया और वही चरखा बाद में भारत के राष्ट्रीय ध्वज में सादगी का प्रतिक बना ।गाँधी जी का मानना था कि प्रत्येक धर्म के मूल में सत्य और प्रेम होता है। उनका कहना है कि ‘कुरान’, ‘बाइबिल’, ‘जेन्द-अवेस्ता’, ‘तालमुड’, अथवा ‘गीता’ किसी भी माध्यम से देखिए, हम सबका ईश्वर एक ही है, और वह सत्य तथा प्रेम स्वरूप है। ढोंग, कुप्रथा आदि पर भी उन्होंने सभी धर्मो के सिद्धान्तों के प्रति सवालिया रुख अख्तियार किया। वे एक अथक धार्मिक समाज सुधारक थे। और छुआछूत जात पात के सख्त विरोधी थे । गाँधी जी के कार्यशैली और जीवन से कई नेताओ ने प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न किया उनमे से कुछ नाम अगर मई आपको बताऊ तो सबसे प्रमुख थे नेल्सन मंडेला, खान अब्दुल गफ्फार खान, अंग सान सु की आदि वैसे गाँधी जी एक प्रेरणाप्रद इंसान थे और इनके जीवन के मूल्यों से हम सभी को सीखना चाहिए और उनकी लिखी हर किताब हमे पढ़नी चाहिए और उनमे से हिन्द स्वराज और सत्य के प्रयोग तो हर व्यक्ति को जरूर पढ़ना चाहिए ।

महात्मा गाँधीजी जयंती की आप सभी को बहोत बहोत शुभकामनाये।

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