Home Dharohar संत कबीर समाधि स्थल , मगहर | Maghar Kabir Samadhi |

संत कबीर समाधि स्थल , मगहर | Maghar Kabir Samadhi |

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काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥

ऐसे ही कई दोहे और अपनी अमृत वाणी से जिन्होंने समाज में एकता, मानवता और अखंडता का सन्देश पहुँचाया ऐसे महान कवी संत कबीरदास जी के निर्वाण स्थल यानी कबीर स्थल के बारे में आज हम जानने वाले है…

कबीर 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिन्दी साहित्य महानतम कवि थे। उनकी रचनाएँ सिक्खों के आदि ग्रंथ में सम्मिलित की गयी हैं। वे हिन्दू धर्म व इस्लाम धर्म को मानते हुए एक सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने सामाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना की। उनके जीवनकाल के दौरान हिन्दू और मुसलमान दोनों ने उन्हें बहुत सहयोग किया l

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सदगुरु कबीर समाधि मंदिर संत कबीर दास नगर में मगहरा में स्थित है। यहां पर आपको संत कबीर दास जी की समाधि एवं मजार दोनों ही देखने को मिलती है। यहां पर हिंदू एवं मुस्लिम दोनों ही संत कबीर दास जी को नमन करने के लिए आते हैं।

सदगुरु कबीर में हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के लोगों की आस्था थी। इसलिए एक तरफ मजार तो दूसरी तरफ समाधि बनाई गई, जहां समाधि है, वहां झोपड़ी थी।1518 में उनके निर्वाण के बाद प्राप्त अवशेष फूल व चादर से रीवा के राजा वीर सिंह बघेल, कबीर साहब के प्रधान शिष्य आचार्य श्रुति गोपाल साहब ने कबीर की समाधि का निर्माण कराया। 18वें आचार्य महंत श्रीगुरुप्रसाद साहब ने परिक्रमा, पूजा स्थल व चबूतरे का 1898 में जीणोद्धार कराया, वही दूसरी ओर बिजली खान पठान के भतीजे फिदाई खान ने मकबरे का निर्माण कराया था।

मगहर में संत कबीर दास की समाधि और मजार अगल-बगल में ही स्थित हैं। कबीर की समाधि और मजार की दीवार आपस में जुड़ी हुई है। मंदिर में जहां फूल-माला चढ़ाकर और घंटे बजाकर पूजा की जाती है, वहीं मजार में चादर चढ़ती है। संतकबीर नगर मुख्यालय से मगहर की तरफ चलने पर आमी नदी के किनारे पर एक गुफा है। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि कबीर दास इसी गुफा में बैठकर ध्यान साधना किया करते थे।
सदगुरु कबीर समाधि को मगहरा धाम भी कहा जाता है। यहां पर उनकी साधना गुफा भी है।

एक वक्त ऐसा था जब मगहर को लेकर लोगों के मन में बहोत डर था। लोगों का मानना था कि मगहर में मरने से नरक मिलता है। इसी डर को खत्म करने के लिए कबीर जीवन के अंतिम दिनों में मगहर चले गए और वहीं पर उन्होने अपनी आखिरी सांस ली।
अगर आप संत कबीर नगर गोरखपुर जाते है तो यहाँ अवश्य जाएँ।

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