Home Dharohar इसरो: अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत का गौरव | ISRO: India’s pride in the field of space |

इसरो: अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत का गौरव | ISRO: India’s pride in the field of space |

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आज हम जानते है साइकिल से लेकर चाँद , मंगल ग्रह और अब सूरज तक के सफर तय करने वाली भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो की। भारत का अंतरिक्ष से नाता तो वैदिक काल से था, और उस वक़्त भारत और चीन के व्यापारिक रिश्ते सिल्क रोड के द्वारा होता था। चीन ने उस काल में पटाखों वाले राकेट का निर्माण कर लिया था, जिसका इस्तेमाल हमने उस वक़्त किया। वहीँ प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलविद बराह मिहिर और आर्यभट्ट का यह मानना है की पृथ्वी गोल है और सूर्य की परिक्रमा कर रही है। वराहमिहिर, विज्ञान के इतिहास में वह प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने कहा की, ‘कोई शक्ति होती है,, जो चीजों को जमीन के साथ चिपकाए रखती है, और इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं’ । मिलिट्री के इस्तेमाल के लिए राकेट का निर्माण भारत में सर्वप्रथम टीपू सुल्तान ने करवाया था।

वहीँ आज़ादी से पहले, वर्ष 1920 तक स्पेस के बारे में और जानकारी हमारे महान वैज्ञानिक एस के मित्रा , सी वि रमन और मेघनाथ सहा इकठ्ठा करना शुरू कर चुके थे, जिसके बारे में १९४०-५० तक भारतीय जनता को पता चला उसी दौरान अमेरिका भी अपने सैटलाइट के परिक्षण कर रहा था।अक्टूबर 1957 की जब USSR ने दुनिया की पहली क्रत्रिम सैटेलाइट स्पटनिक-1 लॉंच की और पूरी दुनिया को सुन्न कर दिया और तब लोगों ने इसकी जरूरत को समझा। तब की भारत सरकार ने 23 फरबरी 1962 को डॉ। विक्रम साराभाई की दूरदर्शिता के आधार पर, परमाणु ऊर्जा विभाग की देख-रेख में INCOSPAR की स्थापना हुई जो आगे चलकर इसरो मे बदल गया। उस समय परमाणु ऊर्जा विभाग को भारत के दिग्गज वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाबा मार्गदर्शन दे रहे थे।
असल में इनकोस्पार के गठन से पहले ही 1961 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अन्तरिक्ष अनुसंधान को परमाणु ऊर्जा विभाग के लिए सौंप दिया था। बाद में विक्रम साराभाई ने अन्तरिक्ष अनुसंधान को INCOSPAR के अधीन चालू किया, INCOSPAR और TATA INSTITUTE OF FUNDAMENTAL RESEARCH ने साथ मिल कर राकेट निर्माण पर काम करना शुरू किया, उस समय टाटा को प्रख्यात भौतिक विज्ञानी, एम जी के । मेनन के द्वारा नेत्रत्व किया जा रहा था , और इस रॉकेट इंजीनीयर टीम के एक युवा सदस्य डॉ। ए पी जे अब्दुल कलाम थे। कमेटी ने निर्णय लिया की वे Thumba Equatorial Rocket Launching Station जोकि थुंबा मे ही तिरुवनत्न्तपुरम के ही पास है, यहा से रॉकेट को लॉंच किया जाएगा, और इस तरह आखिरकार इसरो का गठन 15 अगस्त 1969 को हुआ। वर्तमान में इसरो का मुख्यालय बंगलुरु में स्थित है । इसरो की गतिविधियों को इसके अध्यक्ष के द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है। अपनी तकनीकी प्रगति के साथ इसरो देश में विज्ञान से संबंधित शिक्षा में अपना भरपूर योगदान देता है।
जानते है प्रारम्भ में इसरो की कुछ खास उपलब्धियो के बारे में –
1975 में इसरो ने अपनी पहली सेटेलाइट बना कर तैयार की, और उसका नाम आर्यभट्ट रखा , जिसे 19 अप्रैल 1975 को USSR के द्वारा लांच कर दिया गया। क्यूकि उस समय हमारे पास कोई लॉंच व्हेहिकल नहीं था। SLV-३ भारत में बना पहला लॉंच व्हेहिकल था, जो की सॉलिड फ्यूल पर चलने वाला लांच व्हेहिकल था। और इसका उपयोग करके 1980 में इसरो ने रोहिणी सैटेलाइट को लॉंच किया।
वर्ष था 1985 जब भारत ने नम्बि नारायणन के देख-रेख में यूरोपियन वाइकिंग इंजन से प्रेरणा लेकर विकास इंजन को डेवेलोप किया जो की लुक्विड प्रोपेलेंट पे काम करता है जिसने भारत के हर बड़े मिशन में अपना योगदान दिया है। वर्ष 2008-09 में जब इसरो के चंद्रयान-1 ने चाँद की सतह पर पानी तलाशा तब दुनिया को इसरो की मूल्य समझ आने लगा।
वर्ष 2014 में, भारत के मंगल यान ने पहले प्रयास में मंगल ग्रह पर पहुंचकर इतिहास रच दिया, और इस उपलब्धि के बाद से ISRO कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 2017 में इसरो ने एक साथ 104 सेटेलाइट को एक ही रॉकेट से लॉंच कर के इतिहास के सुनहरे पन्नो में अपना नाम अंकित कर देश को गौरवान्वित होने का एक और अवसर दिया।
सितंबर 2019 को चंद्रयान-2 की क्रैश लैंडिंग की वजह से मिशन के विफल होने पर पूरे देश में मायूसी छा गई था।उस समय इसरो मुख्यालय में मौजूद इसरो चीफ के सिवन बहुत परेशान थे, आँखों में आँसु भरे हुए के सिवन को प्रधान मंत्री मोदी जी ने गले लगा आश्वासन बँधाया।
वहीं इसी वर्ष 2023 मे चंद्रयान -3 की सफल लैंडिंग के बाद् इसरो ने पूरी दुनिया को बताया है कि चंदा मांमाँ अब हमारे और करीब हो गए है। इसरो ने अदित्य एल 1 नाम से एक और मिशन को सौर मण्डल के ऊर्जा के पिंड के अध्ययन के लिए सितंबर 2023 में भेजा है यह सूरज से काफी दूर रह कर हर दिन करीब 1440 से अधिक इमेजेस को भेजेगा जिससे सूरज की ऊर्जा के रहस्य को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकेगी।
1981 मे बैल गाड़ी पर रखा गया था AAPLE सैटेलाइट, यह एक प्रायोगिक कम्युनिकेशन सैटेलाइट थी। सैटेलाइट को बैल गाड़ी पर रख कर ले जाने का फैसला इसरो के वैज्ञानिको का सोचा समझा फैसला था। ऐसा इसलिए किया गया था क्योकि भारतीय वैज्ञानिको के पास अभी तक Electromagnetic Interference Reflection तकनीक की सीमित जानकारी थी और वैज्ञानिक सैटेलाइट को किसी इलेक्ट्रोनिक मशीन पर रख कर नहीं ले जाना चाहते थे। इसी लिए बैलगाड़ी को चुना गया था ।
जानते है इसरो के भावी अन्तरिक्ष मिशन के बारे में –
इसरो का अगला चन्द्र मिशन होगा LUPEX , इसरो ने जापान की अन्तरिक्ष एजेंसी JAXA के साथ साल 2025 में अगला मून मिशन LUPEX को लांच करने की योजना बनाई है, वहीं JAXA इसके लिए रोवर और इसरो लैंडर को विकसित करेगा। इसके साथ साथ इसरो इस वर्ष 2024 के अंत तक गगनयान को भेज सकता है जोकि एक मानव मिशन है। गगनयान एक भारतीय मानव अंतरिक्ष मिशन है जिसका उद्देश्य भारत के अंतरिक्ष में मानव यात्रा को संभावित बनाना है। भारत ने अब तक ऐसा कोई मिशन नहीं किया है। अन्तरिक्ष यात्रियों को भेजने से पहले टेस्टिंग के तौर पर एक AI रोबोट VYOMITRA को भेजा जाएगा । अभी तक प्राप्त जानकारी के हिसाब से इस मिशन के तहत भारतीय गगनयान में तीन मानव यात्री होगे, इस मिशन की अंतरिक्ष यात्रा के लिए उपकरणों की तैयारी ISRO द्वारा की जा रही है। गगनयात्रियों के लिए स्पेसल सूट अंतरिक्ष यात्रा के लिए विशेष रूप से सूट डिज़ाइन किए गए हैं, ताकि मानव यात्री अंतरिक्ष में सुरक्षित रूप से काम कर सकें और उनका स्वास्थ्य और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। भारतीय संगठनों जैसे इंडियन स्पेस फिजिक्स लेबोरेटरी (ISPL), और डिफेंस रिसर्च और डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO), और रूस की ZEVEDA ने मानव यात्रा के लिए सूट और परिधानों के विकास में भाग लिया हैं। ख़बरों में यह भी है की इसरो 2030 तक भारतीय स्पेस स्टेशन बनाने पर भी कार्य करेगा वैसे इसरो के अन्य डेवेलोपमेन्ट देखे तो नाविक को भी इसरो ने डेवेलोप किया है इसरो अलग अलग देशो के सटटेलिते भी काम खर्चे में भेजता है जिस से इसरो को अच्छी आमदनी होती है, और सेटेलाइट लांच में इसरो एक ट्रस्टेड ऑर्गनिज़शन भी बन चूका है। वैसे इसरो के वैज्ञानिको की रहसयमय मृत्यु इसरो के लिए चिंता का विषय रही है और इस लिस्ट में कई नाम शामिल है 2011 के रति के सवाल में इसरो ने जवाब दिया था वर्ष 1995-2010 के बिच में 684 इसरो के एम्प्लोयी की मौत हुई है लेकिन उनकी मौत का कारण नहीं पता चला है। इसी प्रकार विक्रम साराभाई का डेथ दिसंबर 1971 में केरला के एक होटल में हुआ और डेथ का कारण हार्ट अटक बताया गया ऐसी ही कई घटनाओ ने इसरो को समय-समय पर हिला के रख दिया और अब गवर्नमेंट इन सब घटनाओ को संज्ञान में लेते हुए हर एम्प्लोयी को हाई सिक्योरिटी प्रोवाइड कर रही है।

ऐसेही महत्वपूर्ण जानकारी के लिए जुड़े रहिये भाईसाब के साथ।

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