Home सफरनामा आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत निर्मित स्वदेशी इंजन: रफ़्तार 180 Km/Hr : वंदे भारत

आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत निर्मित स्वदेशी इंजन: रफ़्तार 180 Km/Hr : वंदे भारत

by aman.pandey@globalinfocloud.com
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वैसे तो भारत में रेलवे अंग्रेजो का देन है जिसकी शुरुआत उन्होंने अपने फायदे के लिए मालवाहक के रूप में सबसे पहले भारत के मद्रास सहर में 1837 में ग्रेनाइट ढोने के लिए स्थापित किया था फिर बाद में 1853 में पहला प्रवासीय रेलवे लाइन बिछाया गया जो मुंबई से थाने तक 34 किमी यात्रियों को ढोने का काम प्रारम्भ किया, अंग्रेजो से ही प्रेरणा लेकर या यूँ कहें तो उनसे सिख कर आज 21वी सदी में भारत के रेलवे नेटवर्क और अत्याधुनिक तकनीक से बने लोकोमोटिव की चर्चा पूरी दुनिया में है

नमस्कार भाई साब! आज हम बात करेंगे भारत के नए नवेले ट्रैन वंदे भारत और भारत के रेलवे नेटवर्क के बारे में

भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है लेकिन पिछले दसको में रेलवे के पटरियों की दुर्दशा थी इलेक्ट्रिफिकेशन भी नाम मात्र का था, रेलवे स्टेशनो का भी खस्ता हाल और वही पुराने टेक्नोलॉजी पे चलने वाले लोकोमोटिव डिब्बों को ढो रहे थे जिसके वजह से रेलवे को दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता था और हर साल रेलवे घाटे में रहता था ।

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वर्ष था 2017 जब रेलवे के उत्थान के लिए रेल सुरक्षा निधि के माध्यम से 1 लाख करोड़ का एक कोष बनाया गया और रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर बनाने का कदम उठाया गया, इसी कदम का देन आज आपको हर रेलवे स्टेशन साफ़ सुथरा नज़र आता होगा और टेक्नोलॉजिकल भी इनको सुसज्जित किया गया है जैसे की लिफ्ट अक्सेलरेटर बड़े बड़े स्क्रीन यात्रियों की सुविधगा के लिए डिजिटल टिकट की व्यवस्था और पटरियों का इलेक्ट्रिफिकेशन नए पटरियों का निर्माण आदि शामिल है ।
इसी क्रम में हमने लोकोमोटिव पे भी बहुत अच्छा काम किया है उसी का देन है की आज हम बन्दे भारत जैसी ट्रेनों को संचालित कर पा रहे है।

बताते चलें वंदे भारत एक्सप्रेस, जिसे पहले ट्रेन 18 के नाम से जाना जाता था, एक भारतीय सेमि हाई स्पीड ट्रेन और भारत की पहली बिना इंजन की ट्रेन है। यह पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित होने वाली पहली ट्रेन भी है। इसे सवारी डिब्बा कारखाना, चेन्नै द्वारा 18 महीने की अवधि में भारत सरकार के मेक इन इंडिया पहल के तहत डिजाइन किया गया था। पहली रेक की यूनिट लागत लगभग 100 करोड़ रुपया था, और समय के साथ और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट के साथ इसकी मैन्युफैक्चरिंग लागत में काफी कमी आयी आयी है यह ट्रैन 160 किमी प्रति घंटा के रफ़्तार से संचालित होती है और अब इसको भारत के स्टेशनो के बिच में चलने लगी है अभी हाल ही में इसको प्रधान मंत्री जी द्वारा गोरखपुर से भी लांच किया गया है ।
यह ट्रैन बिलकुल बुलेट ट्रैन के मॉडल पर है जो पूरी तरह वातानुकूलित है जिसके दरवाजे आटोमेटिक है और बैठने की व्यवस्था बिलकुल आराम दायक और फ्लाइट के जैसे है, सीसी टीवी कैमरा और ट्रैन में स्क्रीन लगे है जो आपको हर तरह के इनफार्मेशन प्रदान करते है और ब्लाइंड लोगो के लिए ब्रेल लिपि में भी इनफार्मेशन लिखे हुए है ।
इस ट्रैन की खूबसूरती देखने बनती है जिसके कलर कॉम्बिनेशन शुरुआत में सफ़ेद थे लेकिन हाल ही में तिरंगे से प्रेरित हो कर ऑरेंज कलर में लांच किया गया और आगे अन्य रंगो में भी लांच करने की बात कही जा रही है ।

अब बात आती है इसके टिकट की तो आपको बता दूँ इस ट्रैन का टिकट राजधानी के Ac क्लास में ट्रेवल करने जितना ही है इसका वजह है की यह ट्रैन पूरी तरह स्वदेशी है और इसके मैन्युफैक्चरिंग की लागत विदेश से ट्रैन मांगने की लागत से 40% तक कम है ।
दूसरा यह की यह ट्रैन भारत में बिछे पटरियों पर आसानी से चल पाती है जिसके लिए किसी अलग पटरी का निर्माण नहीं किया गया है ।
तीसरी बात यह पूर्णरूप से इलेक्ट्रिक से चलती है ईंधन के लिए यह ट्रैन डीज़ल पे डिपेंडेंट नहीं है
इन सब को ध्यान में रखते हुए इसके टिकट की प्राइसिंग का निर्धारण किया गया है ताकि एक मिडिल क्लास फैमली भी इसके सफर का आनंद उठा सके।

आशा करता हु यह जानकारी आपको पसंद आयी होगी बने रहें भाई साब के साथ ऐसे ही अनोखी ख़बरों के लिए,
धन्यवाद!

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