Home Teej Tyohhar मुस्कुराते हंसते दीप तुम जलाना…| Happy Dipawali |

मुस्कुराते हंसते दीप तुम जलाना…| Happy Dipawali |

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‘मुस्कुराते हंसते दीप तुम जलाना,
जीवन में नई खुशियों को लाना,
दुख दर्द अपने भूल कर,
सबको गले लगाना,
और प्यार से ये दीवाली मनाना’

किसी कवि की ये पंक्ति हमें दु:ख-दर्द भूलाकर और दूसरों को गले लगाकर दीपावली मनाने का संदेश देती है…।

आज ‘दीपावली महापर्व‘ के इस ख़ास लेख में हम जानेंगे दीपावली क्यों मनाई जाती हैं और भाईसाब आपको यह जानकर हैरानी होगी कि देश के विभिन्न धर्मों व विभिन्न स्थानों पर दिवाली मनाने के पीछे अलग-अलग मान्यताएं और अलग तौर-तरीके हैं। हालांकि, सबका मकसद एक ही है और वह है आपसी सद्भाव, समभाव और भाईचारे के संदेश का प्रसार करना।

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– उत्तर भारत में दिवाली का त्यौहार भगवान राम की विजयी गाथा द्वारा शुरू की गई नई परंपरा व उत्सव से जुड़ा हुआ है। हिंदू महाकाव्य रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम, अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ, लंका के राजा रावण को हराने के बाद 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। इनके आगमन की खुशी में पूरी अयोध्या नगरी को दीपों से रोशन किया गया था। तब से ही इस दिन को दिवाली उत्सव मनाया जाने लगा। ये रोशनी के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है, जो 14 साल के वनवास के बाद भगवान राम की घर वापसी की याद दिलाता है। उस समय से ही हर वर्ष दिवाली को अंधेरे पर प्रकाश की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन घर को सजाया जाता है और दीपों से रोशनी की जाती है।
– उत्तर भारत में दिवाली का पर्व 5 दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें पहला दिन धन के देवता कुबेर और भगवान धन्वंतरि से जुड़ा है, जिसे धनतेरस कहते हैं, दूसरा दिन नरक चतुर्दशी का दिन है, इसे छोटी दिवाली भी कहते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर नाम के राक्षस का वध किया था, तीसरा दिन माता सीता और श्री राम के अयोध्या वापस आने से जुड़ा है। इसे बड़ी दिवाली कहते हैं। बड़ी दिवाली के दिन सभी लोग नए कपड़े पहनकर अपने-अपने घरों में शाम के समय गणेश और लक्ष्मी का पूजन करते हैं। फिर दीप जलाने के बाद पटाखे जलाते हैं। चौथा दिन गोवर्धन पूजा यानी श्री कृष्ण की लीलाओं से जुड़ा है तो वहीं पांचवा दिन भाई दूज के रूप में मनाया जाता है। असल में उत्तर भारत में इस त्यौहार की शुरुआत दशहरे के साथ ही हो जाती है।
– वहीं दक्षिण भारत में दिवाली का पर्व केवल दो दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें पहले दिन मनाए जाने वाले नरक चतुर्दशी का विशेष महत्त्व है। नरक चतुर्दशी के दिन यहां के लोग पारंपरिक तरीके से स्नान यानी तेल से स्नान करते हैं। तेल से स्नान इसलिये शुभ माना जाता है क्योंकि यहां के लोगों का मानना है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर राक्षस को मारने के बाद खून के धब्बे हटाने के लिये तेल से स्नान किया था। वहीं, दूसरे दिन दीप जलाकर, रंगोली बनाकर दिवाली मनाते हैं। यहाँ पर लक्ष्मी और नारायण की पूजा होती है।
– दक्षिण में दिवाली वाले दिन एक अनोखी परंपरा मनाई जाती है जिसे ‘थलाई दिवाली’ कहते हैं। थलाई दिवाली के अनुसार, नवविवाहित जोड़े लड़की के घर जाते हैं जहां उनका भव्य स्वागत किया जाता है और घर के सभी बड़े-बुजुर्ग उन्हें आशीर्वाद एवं उपहार देते हैं। फिर वह जोड़ा दिवाली के शगुन के लिये एक पटाखा जलाता है और सभी लोग मिलकर मंदिर में भगवान के दर्शन के लिये जाते हैं।
– इसके अलावा, आंध्रप्रदेश में हरिकथा का संगीतमय बखान होता है और सत्यभामा की मिट्टी की मूर्तियों की पूजा होती है। वहीं कर्नाटक में पहला दिन अश्विजा कृष्ण चतुर्दशी और दूसरा दिन पदयमी बाली के नाम से प्रचलित है। वहाँ पर दूसरे दिन राजा बली से संबंधित कहानियों का उत्सव होता है और महिलाएं गोबर से घर को लीपकर, रंगोली बनाकर दियों से सजाती हैं।
– पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार एवं झारखंड राज्य शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में दिवाली पर गणेश और लक्ष्मी की नहीं बल्कि देवी काली की पूजा का ज़्यादा महत्त्व है। यहाँ के लोग दिवाली पर घरों व मंदिरों में माँ काली की पूजा-अर्चना करते हैं और प्रसाद के रूप में मिठाई, दाल, चावल और मछली चढ़ाते हैं। वहीं ओडिशा में दिवाली के अवसर पर लोग कौरिया काठी करते हैं। यह एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें लोग अपने मृत पूर्वजों की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेने के लिये जूट की छड़ें जलाते हैं। यहां के लोग दिवाली के पर्व पर लक्ष्मी, गणेश और काली की पूजा करते हैं। वहीं, बिहार और झारखंड में दिवाली के पर्व पर पूजा के साथ-साथ पारंपरिक गीत और नृत्य को भी बहुत महत्त्व दिया जाता है। इसके अलावा असम, मणिपुर, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल, सिक्किम और मिज़ोरम जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी काली पूजा का विशेष महत्त्व है।
– पश्चिम भारत के अंतर्गत गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव के क्षेत्र आते हैं। उत्तर भारत की तरह पश्चिम भारत में भी दिवाली का त्यौहार 5 दिनों तक मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र मे यह पर्व केवल चार दिनों तक मनाया जाता है। दक्षिण के लोग पहले दिन वसुर बरस मनाते हैं जिसमें गाय और बछड़े की पूजा की जाती है; दूसरे दिन धनतेरस मनाते हैं जिसमें व्यापारी वर्ग बही-खाते का पूजन करते हैं; तीसरे दिन नरक चतुर्दशी होती है जिसमें उबटन कर सूर्योदय से पहले स्नान करने और स्नान के बाद परिवार सहित मंदिर जाने की परंपरा है। फिर चौथे दिन दिवाली मनाई जाती है जिसमें शाम के समय मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन यहां पर करंजी, चकली, लड्डू, सेव जैसे पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। गुजरात में दिवाली को नए साल के रूप में भी मनाया जाता है।
– वहीं, गोवा जैसे शहर में भी दिवाली की बहुत धूम देखने को मिलती है। यहां पारंपरिक रूप से नृत्य और संगीत पर काफी ज़ोर दिया जाता है। यहाँ की दिवाली भी भगवान राम और श्री कृष्ण के सम्मान में मनाई जाती है। दिवाली से एक दिन पहले यानी नरक चतुर्दशी के दिन यहाँ पर राक्षस के विशाल पुतले बनाए और जलाए जाते हैं।
– मध्य भारत के अंतर्गत प्रमुख रूप से दो राज्य मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ आते हैं। यहां भी दीपावली का त्यौहार 5 दिनों तक मनाया जाता है। यहां के आदिवासियों में भी दीपावली के त्यौहार को लेकर काफी उत्साह रहता है। इस दिन स्त्री-पुरुष सभी नृत्य करते हैं और एक दूसरे के बीच दीपदान की भी परंपरा को निभाते हैं। मध्य भारत में रंगोली की बजाय मांडना बनाने की परंपरा है। यहां दीयों और मोर के पंखों से घर को सजाया जाता है।
– इन सबके बीच यह जानकर हैरानी होगी कि, जब पूरा देश दिवाली मना रहा होता है तब छत्तीसगढ़ के बस्तर के ग्रामीण इलाकों में इसका जिक्र तक नहीं होता। यहां के रहने वाले आदिवासियों में इस त्यौहार को मनाने की कोई परंपरा नहीं है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय ने जरूर वक्त के साथ दिवाली मनाना शुरू कर दिया लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्र के आदिवासियों की मान्यताएं और परंपराएं अब भी बरकरार हैं।
– वहीं बौद्ध धर्म में दिवाली इसलिये इसलिये मनाई जाती है कि इस दिन गौतम बुद्ध अपनी जन्मभूमि कपिलवस्तु में 18 वर्षों के पश्चात वापस लौटे थे।
– वैसे ही जैन धर्म के लोगों की दिवाली मनाने के पीछे यह मान्यता है कि, इसी दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर को बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त हुआ था। जैन लोग दिवाली के त्यौहार को भगवान महावीर के निवार्ण दिवस के रूप में मनाते हैं।
– इसी प्रकार आर्य समाज के लोगों की दिवाली मनाने के पीछे की मान्यता यह है कि, कार्तिक मास की अमावस्या के दिन आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। इसी कारण आर्य समाज के लोग दिवाली का पर्व अति उत्साह के साथ मनाते हैं।
– तो भाईसाब की ओर से सभी वाचकों को मंगलमय शुभकामनाएं. आशा करते है यह जानकारी आपको पसंद आई होगी, ऐसे ही शानदार जानकारी के लिए भाईसाब के साथ जुड़े रहिये… धन्यवाद!

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