Home Mahanubhav 1971 की जंग में पाकिस्तान को धूल चटा दी ! | General Sam Manekshaw |

1971 की जंग में पाकिस्तान को धूल चटा दी ! | General Sam Manekshaw |

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सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के पहले 5 स्‍टार जनरल और पहले ऑफिसर जिन्‍हें फील्‍ड मार्शल की रैंक पर प्रमोट किया गया था। इंतिहास में इंडियन आर्मी का शायद ही कोई ऐसा जनरल हो, जिसने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इतनी लोकप्रियता कभी हासिल की हो, जितनी सैम को मिली थी। सैम मानेकशॉ के 4 दशक के सैन्य करियर में 5 युद्ध शामिल हैं। वह इंडिया के पहले फील्ड मार्शल थे। उनका यह सफर बेहद दिलचस्प रहा है। उनके निधन को 14 साल हो गए हैं, लेकिन आज तक उनकी बहादुरी के किस्‍से और उनके जोक्‍स लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं।

आज हम आपको भारतीय सेना के पहले 5 स्‍टार जनरल सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़े रोचक और प्रेरणादायक किस्सों की जानकारी देने जा रहे है…।

– फील्ड मार्शल की उपाधि पाने वाले पहले भारतीय जनरल।
– इंडियन आर्मी के 8वें चीफ बने।
– बर्मा के खिलाफ लिया था युद्ध में भाग।
– इंदिरा गांधी का विरोध करने में सबसे आगे।
– अच्छे कपड़े पहनने का शौक था।
– द्वितीय विश्व युद्ध में लगी थीं 7 गोलियां।
– इंदिरा गांधी के हेयर स्टाइल की तारीफ की थी।

अपने दोस्तों के बीच सैम के नाम से जाने जाने वाले भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल, 1914 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर और शेरवुड कॉलेज नैनीताल में हुई थी। मानेकशॉ भारतीय सैन्य अकादमी के लिए चुने जाने वाले 40 कैडेटों के पहले बैच के थे और उन्हें 4 फरवरी 1934 को 12 एफएफ राइफल्स में कमीशन किया गया था। सैम मानेकशॉ को उनके दोस्त, उनकी पत्नी, उनके नाती, उनके अफसर या उनके मातहत या तो उन्हें सैम कह कर पुकारते थे या “सैम बहादुर”। बता दें कि 1971 की जंग में पाकिस्तान को हराने और नया मुल्क बांग्लादेश बनाने का पूरा श्रेय सिर्फ फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को जाता है।
सैम मानेकशॉ का पूरा नाम होरमुजजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ था, लेकिन बचपन से ही निडर और बहादुरी की वजह से इनके चाहने वाले इन्हें सैम बहादुर के नाम से पुकारते थे। अमृतसर में पले सैम पापा की तरह डॉक्टर बनना चाहता थे। इसके लिए वो लंदन जाना चाहता थे, क्योंकि उनके दो भाई पहले से ही वहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। पापा ने कहा- तुम अभी छोटे हो। इस बात से गुस्सा होकर सैम ने इंडियन मिलिट्री में शामिल होने के लिए फॉर्म भरा और सेलेक्ट हो गए। जब साल 1971 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से लड़ाई के लिए तैयार रहने पर सवाल किया था। इस बात के जवाब में सैम मानेकशॉ ने कहा था, ‘आई एम ऑलवेज रेडी, स्वीटी’। सैम मानेकशॉ द्वारा कही गई ये बात बहुत फेमस हुई थी।
1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वह मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई कर दें, लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी। इंदिरा गांधी इससे नाराज हुईं थी। मानेकशॉ ने पूछा कि अगर आप युद्ध जीतना चाहती हैं तो मुझे छह महीने का समय दीजिए। मैं गारंटी देता हूं कि जीत हमारी ही होगी। 3 दिसंबर को फाइनली वॉर शुरू हुआ। सैम ने पाकिस्तानी सेना को सरेंडर करने को कहा, लेकिन पाकिस्तान नहीं माना। 14 दिसंबर, 1971 को भारतीय सेना ने ढाका में पाकिस्तान के गवर्नर के घर पर हमला कर दिया। इसके बाद 16 दिसंबर को ईस्ट पाकिस्तान आजाद होकर ‘बांग्लादेश’ बन गया। इसी जंग में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण भी किया।
सैन मानेकशॉ को अपने सैन्य करियर के दौरान कई सम्मान प्राप्त हुए थे। 59 साल की उम्र में उन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि से नवाजा गया था। यह सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय जनरल थे। 1972 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। एक साल बाद 1973 में वह सेना प्रमुख के पद से रिटायर हो गए थे। सेवानिवृत्ति के बाद वह तमिलनाडु के वेलिंग्टन चले गए। वेलिंग्टन में ही वर्ष 2008 में उनका निधन हो गया था।
गोरखा रेजीमेंट से आने वाले सैम मॉनेकशॉ इंडियन आर्मी के 8वें चीफ थे। वो सेना के शायद पहले ऐसे आर्मी चीफ थे जिन्होंने प्रधानमंत्री को दो टूक जवाब दिया था और कहा था कि इंडियन आर्मी अभी पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए तैयार नहीं है। उनको सन् 1971 में पाकिस्तान पर मिली जीत का मुख्य नायक माना जाता है। मानकेशॉ ने अपने चार दशक के मिलिट्री करियर में पांच युद्ध में योद्धा की भूमिका निभाई थी।
सैम मानेकशॉ ने पहले बर्मा अभियान में जापानियों के विरुद्ध कई कार्रवाइयों में भाग लिया। सितांग नदी पर जब वह जापानियों से भिड़ गए, तो पेगू और रंगून की ओर धकेलने के दौरान फील्ड मार्शल (तत्कालीन कैप्टन) मानेकशॉ ने घायल होने के बावजूद साहस और दृढ़ता के साथ अपनी कंपनी का नेतृत्व किया। उनकी वीरता और नेतृत्व के लिए उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया। बाद में वे दूसरी बार फिर से घायल हो गए और उन्हें भारत ले जाया गया।
अपने पूरे सैन्य करियर में सैम मानेकशॉ ने कई कठिनाइयों का सामना किया। छोटी-सी उम्र में ही उन्हें युद्ध में शामिल होना पड़ा था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैम के शरीर में 7 गोलियां लगी थीं। सबने उनके बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, लेकिन डॉक्टरों ने समय रहते सारी गोलियां निकाल दीं और उनकी जान बच गई।
मानेकशॉ को अच्छे कपड़े पहनने का शौक था। अगर उन्हें कोई निमंत्रण मिलता था, जिसमें लिखा हो कि अनौपचारिक कपड़ों में आना है तो वह निमंत्रण अस्वीकार कर देते थे। उनके दोस्त दीपेंदर सिंह ने याद करते हुए बताया, “एक बार मैं यह सोच कर सैम के घर सफारी सूट पहन कर चला गया कि वह घर पर नहीं हैं और मैं थोड़ी देर में श्रीमती मानेकशॉ से मिल कर वापस आ जाऊंगा। लेकिन वहां अचानक सैम पहुंच गए। मेरी पत्नी की तरफ देख कर बोले, तुम तो हमेशा की तरह अच्छी लग रही हो। लेकिन तुम इस “जंगली” के साथ बाहर आने के लिए तैयार कैसे हुई, जिसने इतने बेतरतीब कपड़े पहन रखे हैं?” सैम चाहते थे कि उनके एडीसी भी उसी तरह के कपड़े पहनें, जैसे वह पहनते हैं, लेकिन ब्रिगेडियर बहराम पंताखी के पास सिर्फ एक सूट होता था। एक बार जब सैम पूर्वी कमान के प्रमुख थे, उन्होंने अपनी कार मंगाई और एडीसी बहराम को अपने साथ बैठा कर पार्क स्ट्रीट के बॉम्बे डाइंग शो रूम चलने के लिए कहा। वहां ब्रिगेडियर बहराम ने उन्हें एक ब्लेजर और ट्वीड का कपड़ा खरीदने में मदद की। सैम ने बिल दिया और घर पहुंचते ही कपड़ों का वह पैकेट एडीसी बहराम को पकड़ा कर कहा,”इनसे अपने लिए दो कोट सिलवा लो।”
इंदिरा गांधी के साथ उनके कई किस्से मशहूर हैं। एक बार इंदिरा गांधी जब विदेश यात्रा से लौटीं तो मानेकशॉ उन्हें रिसीव करने पालम हवाई अड्डे गए। इंदिरा को देखते ही उन्होंने कहा कि आपका हेयर स्टाइल जबरदस्त लग रहा है। इस पर इंदिरा गांधी मुस्कराईं और बोलीं, और किसी ने तो इसे नोटिस ही नहीं किया।
अपने करियर के दौरान, मानेकशॉ ने 5 युद्ध लड़े थे- विश्व युद्ध 2, भारत पाकिस्तान विभाजन, 1962 का चीन भारतीय युद्ध, 1965 और 1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध। 27 जून 2008 को, तमिलनाडु के वेलिंगटन के सैन्य अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।

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