Home Latest पर्यावरण का काल बनेगा फैशन कचरा | Fashion Garbage: Pollution |

पर्यावरण का काल बनेगा फैशन कचरा | Fashion Garbage: Pollution |

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भाईसाब, आपको एक हैरान कर देने वाला खुलासा करता हूं कि कपड़ों की अनावाश्यक खरीददारी से पर्यावरण को बेहद नुकसान हो रहा है।
भारतीयों में ऑनलाइन शॉपिंग करना अब आम हो गया। कुछ लोग अपनी जरूरत के अनुसार ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं। वहीं कुछ लोगों के लिए यह एक लत बन जाती हैं। लती लागों को ऑनलाइन तरह-तरह की आइटम्स खरीदना अच्छा लगता है। यहां तक कि वे ऐसी चीजों की शॉपिंग भी करते हैं, जिनकी उन्हें वास्तव में जरूरत नहीं होती है। आज के इस लेख में हम एक ताजा सर्वे के जरिये खुलासा करेंगे कि कैसे कपड़ों की खरीददारी से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है ? और हां ब्रिटेन और भारत में ऐसे लोगों की संख्या सर्वाधिक है जो बिना जरूरत कपड़ों की ऑनलाइन खरीददारी करते हैं।

भाईसाब, इतना जरूर जान लें कि देश और विदेश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो भारी डिस्काउंट देखकर कपड़ों के लिए ऑनलाइन शॉपिंग कार्ट भरने या स्टोर्स पर लाइनों में लगने में भी हिचकिचाते नहीं। लेकिन भाईसाब, क्या आपको पता है, कपड़ा खरीदारी की यह होड़ व्यक्ति और पर्यावरण दोनों पर भारी पड़ती है क्योंकि दुनिया के कुछ देशों में लोग इन कपड़ों को एक बार भी नहीं पहनते। हाल ही में किये गये एक ताजा सर्वे के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या ब्रिटेन और भारत में सर्वाधिक है। अक्टूबर, 2022 से सितंबर, 2023 तक किए गए इस सर्वे में 56 देशों के 18-64 आयु वर्ग के लोग शामिल थे। भाईसाब, इस ताजा सर्वे में पाया गया कि ऐसी खरीदारी में महिलाओं की संख्या अधिक होती है। ब्रिटेन में 29 फीसदी और भारत में 24 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकारा की वे अक्सर ऐसे कपड़े खरीदती हैं, जो उनकी अलमारी में रखे रह जाते हैं। पिछले साल ब्रिटेन में हुए एक अन्य सर्वे में भी देखा गया कि ब्रिटेन के लोग महज ट्रेंड का हिस्सा बनने के लिए भी खरीदारी करते हैं। खरीदारी में तेजी का यह चलन अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और चीन में भी मौजूद है। हालांकि अनावश्यक खरीदारी का प्रतिशत अलग-अलग देशों में भिन्न-भिन्न है। भाईसाब, क्या आपको पता है, एक कॉटन टी-शर्ट बनाने में 3,000 लीटर से अधिक पानी लगता है। कपड़ों से निकलने वाले हानिकारक रंग जलमार्गों को प्रदूषित करते हैं। हानिकारक रसायन बांग्लादेश, कंबोडिया और वियतनाम जैसे बड़े कपड़ा उद्योगों वाले देशों में आबादी को प्रभावित करते हैं। फैशन उद्योग सालाना 10 फीसदी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। भाईसाब इतना ही नहीं टेक्सटाइल वेस्ट से भरा एक ट्रक हर सेकंड लैंडफिल साइटों पर पहुंच जाता है। यही प्रवृत्ति जारी रही तो दशक के अंत तक फास्ट फैशन कचरा प्रति वर्ष 13 करोड़ टन तक बढ़ने की आशंका है। आपको बता दें कि फास्ट फैशन के चलते कपड़ों का निर्माण बहुत तेजी से हो रहा है और यह बहुत सस्ते में बनाए व बेचे जा रहे हैं। फास्ट फैशन एक चलन है क्योंकि इन कपड़ों को अक्सर थोड़े समय के लिए पहना जाता है। उपभोक्ता इनको डिस्पोजेबल कपड़ों के रूप में देखते हैं। इन कपड़ों के उत्पादन की लागत बेहद कम होती है और अक्सर ये खराब गुणवत्ता वाली सामग्री से बने होते हैं। आमतौर पर ये कपड़े वर्तमान में चल रहे फैशन के लिए डिजाइन किए जाते हैं, जिसका मतलब है कि नए उत्पाद लगातार हर समय स्टोर में आते रहते हैं।
भाईसाब, दुनियाभर के विशेषज्ञ इसे लेकर चिंतित हैं। फिनलैंड, स्वीडन, अमेरिका, UK और UNSW के विशेषज्ञों ने भी फैशन सप्लाई चेन के पर्यावरणीय प्रभावों की पहचान की। इसमें उत्पादन से लेकर उपभोग तक, पानी की खपत, रासायनिक प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन और कपड़े के कचरे पर ध्यान केंद्रित किया गया। टेक्सटाइल और फैशन उद्योग एक लंबी सप्लाई चेन है, जो कृषि और पेट्रोकेमिकल उत्पादन से लेकर विनिर्माण, आपूर्ति और खुदरा क्षेत्र तक है। उत्पादन के हर चरण में पानी, सामग्री, रसायनों और ऊर्जा का इस्तेमाल होने से पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। यह उद्योग हर साल 92 मिलियन टन से अधिक कचरा उत्पन्न करता है और प्रति वर्ष लगभग 1.5 ट्रिलियन टन पानी की खपत करता है। विकासशील देशों के साथ अक्सर यह विकसित देशों के लिए भी एक बोझ बन जाता है।
भाईसाब, आपको जानकारी देना जरूरी है कि तेजी से बढ़ता फैशन उद्योग हमारे ग्रह के अस्तित्व को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। आए-दिन बदलते फैशन के चलते कपड़ों का निर्माण बहुत तेजी से हो रहा है, जिसकी वजह से यह दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में से एक बन गया है।
तो भाईसाब, ये थी जानकारी कपड़ों की खरीददारी से पर्यावरण को नुकसान के बारे में, आशा करते हैं कि यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही किसी अन्य रोचक जानकारी के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ, धन्यवाद!

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