Home Latest किसान छोड़ रहे खेती-बारी ! | Farmer’s Issue |

किसान छोड़ रहे खेती-बारी ! | Farmer’s Issue |

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भाईसाब…आज हम देश के किसानों की बात करेंगे…। ये जमीन से जुड़े लोग ही देश के असली हीरो हैं…। ये ही हमारे अन्नदाता हैं लेकिन आज धरती के खोक से अन्न को जन्म देने वाला भूखा है…उसके पास पानी तो है फिर भी प्यासा है…। आज के इस लेख में हम देश के किसानों का बदहाल जानेंगे…।इसे पढ़ने के बाद आप सोचने के लिए मजबूर हो जाएंगे कि..वाह…मेरा देश ‘विकास’ तो कर रहा पर किसान तो ‘हताश’ हो रहा है…।
भाईसाब…आपदा में अवसर ऐसा मुहावरा है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने और भी लोकप्रियता दी है। भारतीय कृषि के संदर्भ में यह मुहावरा काम का साबित हो सकता है। बार-बार ये बात कही गई है कि भारतीय कृषि संकट में है। किसानों की बदहाली से लेकर, भुखमरी और किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। कृषि और किसानों को लेकर नीति निर्माता से लेकर विश्लेषक तक दया का भाव रखते हैं। किसानों की कारुणिक छवि को दो बीघा जमीन, मदर इंडिया और सद्गति जैसी फिल्मों ने और भी पुष्ट किया है।
लेकिन…भाईसाब…भारत में हर दिन 4,000 किसान खेती-बारी छोड़ रहे हैं। किसानों की आर्थिक हालत जस की तस पहले से ही बनी हुई है। आर्थिक उदारीकरण का फायदा हर सेक्टर को मिला है। लेकिन किसान इससे पूरी तरह से वंचित रहे हैं। सवाल इस बात का है खेती मुनाफे का सौदा कब बनेगी जब ये सेक्टर ही पूरी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार है। देश का हर चौथा वोटर पेशे से किसान है और आर्थिक तौर से कमजोर होने से अब गरीबी और संकट के कगार पर पहुंच गया है। नतीजा देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसान और कृषि सेक्टर मरणासन्न अवस्था को जा पहुंचा है। इसे दोबारा से जीवंत बनाना देश की अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए बेहद जरूरी है। कृषि सेक्टर में कई ऐसी कमियां हैं जो इसके विकास और किसानों की जिंदगी पर असर डालती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में रोजाना 4,000 किसान खेती छोड़कर कोई दूसरा पेशा अपना रहे हैं। आलम ये है कि किसान परिवारों का युवा वर्ग भी इस पेशे में दिलचस्पी नहीं ले रहा है। कृषि विश्वविद्यालयों से ग्रेजुएशन करने के बाद भी युवाओं का एक बड़ा तबका दूसरे पेशों को तवज्जो दे रहा है। इस तरह के हालात को एक्सपर्ट ‘एग्रो ब्रेन ड्रेन’ कहते हैं। कृषि अर्थव्यवस्था में उपजे इस गंभीर संकट का असर खेतों और गैर-कृषि वर्क फोर्स दोनों पर पड़ा है।
भाईसाब….विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि से किसानों का मोहभंग होने का सबसे बड़ा कारण लागत का बढ़ जाना है। बढ़ी हुई लागत के बाद भी खेती में उत्पादन उसकी लागत के मुताबिक नहीं हो पाता है और किसान को उतना फायदा नहीं हो पाता कि वो अपने परिवार का खर्च चला सकें तो वो इससे दूर भागने लगते हैं। फिर वो रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे सेक्टर की तरफ जाते हैं। वो कहीं दूसरी जगह नौकरी और व्यापार करने की सोचता है। खासतौर से आज युवा किसान पूरी तरह से खेती से विरक्त हो चुका है। किसानी-खेती से किसानों के दूर जाने की दूसरी वजह जलवायु परिवर्तन है। वैसे तो भारत का किसान मानसून प्रधान खेती का आदी रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने उसकी परेशानी और बढ़ा दी है। कभी सूखा, कभी वर्षा इससे भी खेती को नुकसान पहुंचता है।
भाईसाब…ये बताना बहुत जरूरी है कि एक बस्ती शहरी तब बनती है जब उसकी आबादी कम से कम 5000 की, जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी और कम से कम 75 फीसदी पुरुष आबादी कृषि से अलग काम करती हो। ये सेंसस टाउन के तौर पर पहचानी जाती है। हालांकि इसमें नगरपालिका, निगम, छावनी बोर्ड और एक अधिसूचित नगर क्षेत्र समिति शामिल नहीं होते हैं। 2001 और 2011 की जनगणना पर गौर किया जाए तो शहरी बस्तियों में इजाफा हुआ है। ये 11 साल में 1,362 से बढ़कर 3,894 तक पहुंच गई। ये इस बात का सबूत पेश करता है कि गांवों के लोग खेती किसानी को अलविदा कह गैर कृषि कामों को तवज्जो दे रहे हैं। देश के इतिहास में यह पहला मौका था जब 2011 की जनगणना में गांवों की आबादी में गिरावट देखी गई थी। ये भी देखा गया है कि भले ही गांवों में लोग बेरोजगार रह लें, लेकिन वो अपनी छोटी सी जमीन पर भी खेती करना पसंद नहीं कर रहे हैं। ये भारत के बदलते स्वरूप का एक संकेत है।
भाईसाब….यदि सरकार को किसानों की स्थिति को सुधारना है तो….किसानों के पास जो मॉडर्न मार्केटिंग फैसिलिटी है उनको जब-तक आप बढ़ावा नहीं देंगे तब तक किसानों के हालातों में सुधार नहीं आएगा। सरकार को अपने नजरिए को कंज्यूमर सेंट्रिक न कर फार्मर सेंट्रिक करना होगा। जैसे जब दाम गिरते हैं तो उस पर हंगामा नहीं होता, लेकिन जब दाम बढ़ते हैं तो उस पर हंगामा हो जाता है क्योंकि कंज्यूमर को दाम ज्यादा लगता है, लेकिन ये कोई नहीं देखता कि किसान को लॉस हो रहा है। ये छोटी सी चीज है, लेकिन इस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। कृषि उपज बाजार पर जब-तक अच्छे से ध्यान नहीं दिया जाएगा और जो विकल्प सरकार के पास हैं उन पर सरकार अच्छे से काम नहीं करेगी तब तक खेती को एक मुनाफे के कारोबार में बदलना मुश्किल है।
भाईसाब….दुनिया के अनुभवों से सीखे भारत को भी सीखने की जरूरत है। दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां कम लोग ज्यादा उपज पैदा कर रहे हैं। इसका सबसे सफल तरीका खेती का आधुनिकीकरण और मशीनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना है। दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएं प्रेसिसन फॉर्मिंग की तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसमें स्थान और समय की जरूरतों के हिसाब से खेती का तरीका तय किया जाता है। इसलिए लिए तमाम तरह के आंकड़ों, उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का प्रयोग होता है। सिंचाई की पद्धति भी ऑटोमैटेड की जा सकती है। इन सबसे कम क्षेत्र में ज्यादा उपज लेना संभव हुआ है।
ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में विशाल खेतों में बड़े पैमाने पर खेती का प्रयोग सफलतापूर्वक किया गया, जिसके अच्छे परिणाम आए। ऐसे खेतों में आधुनिक तरीके से मशीनों से खेती करना संभव होता है और ज्यादा लोगों की जरूरत भी नहीं पड़ती।
ग्रीनहाउस खेती, वर्टिकल फार्मिंग, और हाइड्रोपोनिक्स जैसी नई तकनीक के इस्तेमाल से नीदरलैंड जैसे देश कृषि उपज के निर्यात में ग्लोबल लीडर बन चुके हैं। सवाल है कि क्या भारत के नीति बनानेवालों की नजर इस ओर है?…भाईसाब…मैं ये सवाल आपके लिए भी छोड़े जा रहा हूं…जरा गंभीर चिंतन कीजिए…क्योंकि जो रोटी हम खा रहे हैं उसे उगाने वाला कहीं-न-कहीं…भूखा सो रहा होगा?
तो भाइसाब…आशा करते हैं ये जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी…। अपना कमेंट हमें जरूर भेजिए…। धन्यवाद!

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