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दहेज के आधुनिक स्वरूप | Dowry System

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Dowry System

भाईसाब, आधुनिक समय में दहेज प्रथा ऐसा रूप धारण कर चुकी है, जिसमें लड़के वाले के परिवार वालों का सम्मान लड़के को मिले हुए दहेज पर ही निर्भर करता है। वह खुलेआम अपने बेटे का सौदा करने के लिए राजी रहते हैं। वहीं, दूसरी ओर लड़की वाले भी दहेज देने तो तैयार रहते हैं, बस शर्त इतनी रहती है, कि लड़का सरकारी नौकरी वाला चाहिए, घर खुद का होना चहिए और हां लड़का इकलौता भी होना चाहिए।

तो भाईसाब क्या सचमुच यही हमारे मूल्य हैं, जिस भारतीय संस्कृति का ढोल हम पूरे संसार में पिटते हैं, क्या वह हमें हमारे बच्चों का मोलभाव करना सिखाता है? अक्सर अरेंज्ड मैरिज में बेटों का मोलभाव ही तो होता है। अगर बेटा इंजीनियर है तो 20 लाख, दरोगा है तो 40 लाख, वगैरह-वगैरह और मनपसंद उपहारों की सूची अलग से। यह सब मैं यूं ही नहीं बता रहा हूं बल्कि ऐसा समाज में होता है। और ये भी सच्चाई है कि लड़की वालों को अपनी लड़की के लिए चरित्रवान, गरीब लड़का नहीं चाहिए, भले ही वो पढ़ा-लिखा हो, उन्हें तो बस, अमीर, सरकारी नौकरी वाला लडका चाहिए, भले ही उसके शौक गंदे हो चलेगा, लड़की वालों दहेज देने के लिए तैयार रहते हैं।

भाईसाब, दहेज प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। रामायण तथा महाभारत में कन्याओं की विदाई के समय पर माता-पिता द्वारा दहेज के रूप में धन–सम्पति देने का उदाहरण मिलता है, परन्तु उस समय लोग दहेज को स्वार्थ की भावना से नहीं लेते थे, और लड़के वालों की ओर से कोई मांग नहीं की जाती थी। उस समय विवाह को एक पवित्र एवं धार्मिक बंधन माना जाता है जिसमे दो परिवारों का मिलन होता है, उस समय दहेज लड़की के माता–पिता लड़की के लिए सामान के रूप में दिया करते थे। ये बिना लोभ के लड़के वाले रख लेते थे। परन्तु जैसे – जैसे समय बीतता गया और समाज में यह प्रथा भी आगे बढ़ती गई। वर्तमान समय में यह दहेज लेना एक लालच बन गया है। शुरुआती समय में तो दहेज में जेवर और कपड़े ही देते थे, लेकिन वर्तमान समय में यदि लड़का सरकारी नौकरी पर है तो लड़के के माता–पिता सामने वालो से गाड़ी, सम्पति और रकम की मांग करने लग गए है।
भाईसाब, हैरानी की बात तो यह है कि जब इस प्रथा की शुरूआत की गई तब से लेकर अब तक इस प्रथा के स्वरूप में कई नकारात्मक परिवर्तन देखे जा सकते हैं। वर्तमान समय में दहेज व्यवस्था एक ऐसी प्रथा का रूप ग्रहण कर चुकी है जिसके अंतर्गत युवती के माता-पिता और परिवारवालों का सम्मान दहेज में दिए गए धन-दौलत पर ही निर्भर करता है। वर-पक्ष भी सरेआम अपने बेटे का सौदा करता है। प्राचीन परंपराओं के नाम पर युवती के परिवार वालों पर दबाव डाल उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। इस व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले लिया है। भाईसबा, संपन्न परिवारों को शायद दहेज देने या लेने में कोई बुराई नजर नहीं आती, क्योंकि उन्हें यह मात्र एक निवेश लगता है। उनका मानना है कि धन और उपहारों के साथ बेटी को विदा करेंगे तो यह उनके मान-सम्मान को बढ़ाने के साथ-साथ बेटी को भी खुशहाल जीवन देगा। लेकिन भाईसाब, निर्धन अभिभावकों के लिए बेटी का विवाह करना बहुत भारी पड़ जाता है। वह जानते हैं कि अगर दहेज का प्रबंध नहीं किया गया तो विवाह के पश्चात बेटी का ससुराल में जीना तक दूभर बन जाएगा। भाईसाब, लड़कियां आज भी भले ही पढ़ी-लिखी क्यों न हो, अपने पैरों पर खड़ी हो, मगर शादी के लिए लड़की वालों को दहेज की मांग पूरी करनी ही पड़ती है। यही वजह है कि लड़कियां अभी भी दहेज की आग में जल रही हैं। भाईसाब सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2022 में दहेज़ के लिए 6516 बेटियां बलि चढ़ा दी गई, वहीं साल 2022 में हर रोज 17 बेटियों को दहेज़ के लिए मौत दी गई, जबकि 2022 में ही देश के विभन्न थानों में दहेज़ प्रताड़ना के 14 लाख 4 हजार 593 प्रकरण दर्ज हुए। देश के पुलिस थानों में यह आंकड़ा लगभग हर साल बढ़ता है लेकिन समाज का दहेज़ लोभी होने का प्रतिशत कम नहीं हो रहा। भाईसाब, दहेज प्रथा के खिलाफ कानून भी बने हैं, दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।

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चलते-चलते भाईसाब, काम की बताते चलें, ऐसा नहीं है कि, दहेज़ कुप्रथा के मामले में दोषी कोई एक पक्ष है बल्कि समाज में रहने वाला हर तबका सामूहिक रूप से जिम्मेदार है। मां-बाप अपनी बेटी के लिए अच्छे इंसान की बजाए घर-मकान और पैसा अधिक तलाशते है वहीं बेटे के मां-बाप अच्छी बहु की बजाए दहेज अधिक देने वाले परिवार को, लालच दोनों तरफ से है,सोचना आपको है क्या करना है…

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