Home Gali Nukkad फॉरवर्ड क्लास वाले छोड़ दें आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट में बहस | Debate on Reservation

फॉरवर्ड क्लास वाले छोड़ दें आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट में बहस | Debate on Reservation

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Debate on Reservation

भाईसाब, इन दिनों आरक्षण को लेकर देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं सुप्रीम कोर्ट में पंजाब की अनुसूचित जाति के आरक्षण को लेकर चली बहस ने दिलचस्प मोड़ ले लिया, दलित समुदाय से आने वाले जस्टिस बीआर गवई ने ही इसे लेकर गंभीर सवाल पूछ लिए, सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि पिछड़ी जातियों के जिन लोगों को आरक्षण का फायदा मिल चुका है, क्या वे इसे अब छोड़ नहीं सकते ताकि उनके ही वर्ग के दूसरे लोगों को इसका फायदा मिले?

भाईसाब, आपको बताना जरूरी है कि खुद दलित समुदाय से आने वाले और अगले वर्ष मई में चीफ जस्टिस बनने जा रहे गवई ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग का एक शख्स यदि IAS या IPS बन जाता है तो उसके पास बेहतरीन सुविधाएं होती हैं, कोई अभाव नहीं रह जाता, इसके बाद भी उसके बच्चों और फिर बच्चों के भी बच्चों को आरक्षण मिलता है, सवाल यह है कि क्या यह जारी रहना चाहिए? भाईसाब, बता दें कि पंजाब सरकार ‘पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग कानून 2006 के वैध होने का बचाव कर रही है. जबकि सुप्रीम कोर्ट आर्थिक तौर पर मजबूत जातियों को इससे बाहर लाने की बात कर रहा है, इस बीच ये मुद्दा भी आता है कि कोटा सिस्टम कुछ समय के लिए दिया गया था, फिर आजादी के 7 दशक से ज्यादा बीतने के बाद भी क्यों चला आ रहा है, भाईसाब, पंजाब में SC के आरक्षण को लेकर 2006 में एक फैसला लिया गया था, इसके तहत 2 समुदायों को महादलित का दर्जा दिया गया था और कुल 15 फीसदी आरक्षण में से आधा हिस्सा उनके लिए रिजर्व किया गया था, इस तरह 2 समुदायों को SC आरक्षण में प्राथमिकता मिली थी, लेकिन 2010 में हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था, अब पंजाब सरकार इसके बचाव में उच्चतम न्यायालय पहुंची है, जहां आरक्षण को लेकर दिलचस्प बहस चल रही है। भाईसाब, आजादी के करीब 2 दशक पहले से भी रिजर्वेशन की हल्की-फुल्की शुरुआत हो चुकी थी, ब्रिटिश सरकार ने अनुसूचित जातियों को कोटा देने की पहल की, आजादी से पहले संविधान सभा बनी, जिसमें आरक्षण पर चर्चा होने लगी, कई समितियां बनती रहीं, भाईसाब, इसी दौरान सवाल उठा कि रिजर्वेशन जाति के आधार पर मिले, न कि आर्थिक आधार पर, बहस के लिए कई बातें थीं, जैसे पिछड़ा किसे माना जाए, और उन्हें कितने समय तक कोटा में रखा जाए, काफी चर्चा के बाद तय हुआ कि आरक्षण का असल मकसद छूआछूत को मिटाना और सबको बराबरी पर लाना है। भाईसाब, इसके साथ ही संविधान में जातिगत रिजर्वेशन की शुरुआत हुई, इस श्रेणी में वे लोग आते हैं, जिन्हें पुराने में छूआछूत का सामना करना पड़ा था, चूंकि सामाजिक स्तर पर ये पिछले हुए थे तो जाहिर बात है कि आर्थिक तौर पर भी ये पीछे ही रह गए, इन्हें ही मुख्यधारा में लाने की कवायद शुरू हुई, जो अब तक जारी है. भाईसाब, अब जाति के आधार पर आरक्षण के विरोध में काफी आवाजें उठ रही हैं, कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यकों का वर्गीकरण आर्थिक आधार पर हो. यानी ऐसे लोगों को फायदा मिले, जिनके पास कमाई का साधन नहीं, जबकि पैसों और शिक्षा में आगे निकल चुके लोगों को आरक्षण की श्रेणी से हटा दिया जाए, हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि आरक्षण का मकसद अगर पूरा हो जाए तो ऐसे लोगों को उससे बाहर किया जाना चाहिए ताकि जरूरतमंद को लाभ मिल सके.

चलते-चलते भाईसाब, बता दें कि आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर गरमाया हुआ है, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि जिन पिछड़ी जातियों को रिजर्वेशन का पूरा फायदा मिल चुका, उन्हें अब ये छोड़ देना चाहिए ताकि अति-पिछड़ों को ज्यादा जगह मिल सके, आरक्षण के खिलाफ बोलने वालों का ये भी कहना है कि यह केवल 10 सालों के लिए लागू था. संवैधानिक पीठ ने ये सवाल किया कि पिछड़ी जातियों की संपन्न उपजातियों को रिजर्वेशन के दायरे से बाहर क्यों नहीं किया जा रहा, इससे वो सामान्य वर्ग के साथ कंपीटिशन करेगा, फिलहाल चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ये देख रही है कि क्या राज्य अनुसूचित जातियों और जनजातियों में सब-कैटेगरी कर सकते हैं.

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