Home Cinema कभी शराफत की जिन्दगी जीती थीं : लखनऊ की तवायफें | Courtesans of Lucknow |

कभी शराफत की जिन्दगी जीती थीं : लखनऊ की तवायफें | Courtesans of Lucknow |

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भाईसाब…क्या आपकों पता है, नवाबों के शहर लखनऊ ने एक दौर में नृत्य और संगीत में काफी उन्नति की थी। नृत्य और संगीत की बात हो और यहां तवायफों का जिक्र न हो ऐसा तो नामुमकिन ही है। लखनऊ की तवायफें ने अपने उसूलों के कारण बड़ी शोहरत हासिल की थी। एक वक्त था जब यह तवायफें भी शराफत की जिन्दगी जीती थीं। समाज में उनकी एक इज्जत थी। भाईसाब..आपको ये बता दे कि लखनऊ की तवायफों के कोठे तहजीब और तमीज के मदरसे थे। नवाब, रईस यहां तक के अंग्रेज अफसर भी अपनी औलादों को तवायफों के कोठों पर उठने-बैठने, बातचीत करने का सलीका सीखने के लिए भेजते थे। उस समय अश्लीलता का कहीं कोई नामों निशान न था। सलाम करने, पान पेश करने का ढंग, खातिरदारी के तौर-तरीके उन्हीं कोठों से ही महलों व घरों में आये। तो…आज के इस लेख में हम जानेंगे लखनऊ की तवायफों की जिंदगी के बारे में।

भाईसाब…जैसे हमारा समाज अलग-अलग जाति और अलग-अलग धर्म में बंटा है ठीक वैसे ही लखनऊ की तवायफें की तीन जातियां थीं–कंचनियां, चुनेवालियां और नागरानियां। कंचनियां जाति की तवायफें शुजाउद्दौला के वक्‍त में पंजाब और दिल्‍ली से लखनऊ आ गयी। ‘कंचनियां’ जिनका पेशा केवल सतीत्व बेचना ही होता था। चुनेवालियां और नागरानियां जाति की तवायफों को बड़ी इज्जत बख्शी जाती थी। एक वक्त में चूनेवाली ‘हैदरी’ नामक तवायफ का गला इतना मीठा था कि जब वह गाती तो लोग बेसुध हो जाया करते थे। नवाब वाजिद अली शाह के वक्‍त में तवायफों का लखनऊ में बड़ा जोर रहा। अकबरी दरवाजे से लेकर फिरंगी महल तक तमाम तवायफें ही बसी थीं। लखनऊ की मशहूर गाने वालियों में हैदरी और दिलबर की आवाज अगर दिलकश थी तो ‘नजमा’ नाम की तवायफ को राग-रागिनियों की अदाकारी में महारत हासिल थी। भाईसाब, माना जाता है कि कुछ तवायफ जिस्म बेचने से कोसों दूर रहती थीं। किसी एक की होकर ही सारी जिन्दगी गुजार देती थी ऐसी तवायफों को ‘तवायफ खानगी’ कहते थे। ऐसी बात नहीं कि पेशे वाली तवायफ थी ही नहीं। हां इनकी भनक तक लोगों को नहीं मिलती थी।

भाईसाब, तवायफों की उस वक्‍त बड़ी इज्जत थी इसका अन्दाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब यह दावतें देती तो सारे शहर के शरीफ इनके कोठे पर तशरीफ लाते। तवायफों में सबसे ऊंची जाति डरेदार तवायफों की मानी जाती थी। इनमें मुनीर बेगम, जरीना बेगम, अनवरी बेगम बड़ी मशहूर रहीं जो अच्छी गायिकाएं भी थीं। तवायफों के कोठे पर न कोई अमीर होता न गरीब। जब महफिल जमती तो फर्श पर खूबसूरत कालीन और सफेद चादर बिछा दी जाती, तकिये लग जाते। लोग मुजरे सुनते। जो बन पड़ता खामोशी से तकिये के नीचे दबा देते। मुजरा खत्म होता इलायची व पान पेश किये जाते। जब सब लोग चले जाते तब तकिये के नीचे से रुपये निकाले जाते। ऐसा इसलिए होता कि मुजरे में अमीर भी आते कम हैसियत वाले भी। कौन कितना दे रहा है यह किसी को न मालूम हो।

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भाईसाब..आपकी जानकारी के बता दें कि तवायफ, हुसैनाबादी बेमिसाल गजल गायिका थी। नक्खास में उसका मशहूर इमामबाड़ा था। इसी तरह एक तवायफ थी ‘उमराव जान’ खुद गजलें लिखती खुद गाती। एक से बढ़कर एक गजल लेखक व गायक उसके पास आते थे। तवायफ नन्हुवां और बचुवा लखनऊ में ही नहीं विदेशों में मशहूर रहीं। यह दोनों तवायफें ‘बड़ी चौधराइन’ और ‘छोटी चौधराइन’ के नाम से जानी जाती थीं। चौधराइन का 500 रुपये माहवार खर्च केवल पान पर ही था। उनकी बेटी ‘रश्के मुनीर’ हुस्ने-ए-मलिका थी। इसकी शादी बम्बई के एक शरीफ और इज्जत- दार खानदान में सेठ सुलेमान के लड़के से हुई थी। सन्‌ 1940 ई. में महमूदाबाद के महाराज के महल में जब मुहम्मद अहमद हसन खाँ के विवाह पर महफिले जमीं तो लखनऊ से तमाम तवायफें बुलायी गयी इनमें–जहन बाई, बेगम अख्तर, रसूलन बाई, मलिका पुखराज, वहीदन बाई मुख्य थीं। जब इस बारे में ग्रामोफोन रिकार्ड बनाने वाली एक कम्पनी को पता लगा तो वह अपनी मशीनें लादकर महाराजा महमूदाबाद के महल जा पहुंची। लखनऊ की अन्य मशहूर तवायफों में बेनजीर, अल्लारखी, नसीम आरा, दिलरुबा, शमीम बानों, राधा, जोहरा, बड़ी जहन, छोटी जहन, माहलका, अल्लाह बाँदी, जेली खुर्बोद, कमर जहाँ, सुन्ती बाई मुख्य थीं। 1958 के बाद से सरकार ने इन्हें लखनऊ से नेस्तनाबूद करके ही दम लिया।
भाईसाब, एक वक्त ऐसा भी आया कि लखनऊ के भांड अपने सुनहरे दिनों में वहां की तवायफ़ों के लिए बड़ी चुनौती बन गए थे। भांडों को मात देने के लिए तो तवायफों ने ख़ैर मुजरों से अलग नृत्य की एक नई शैली ईजाद कर ली। इसमें वे पैरों में घुंघरू बांधकर किसी भांड के साथ खड़ी हो जातीं। फिर घुंघरुओं की झंकार के साथ थिरक-थिरककर भाव के साथ ऐसा नृत्य पेश करतीं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते। उन दिनों इस तरह के नृत्य पर वाह-वाह करने वाले नवाबों के दरबार से लेकर आम टोले-मुहल्लों की छोटी-मोटी महफ़िलों तक में आते थे। सो, तवायफ़ों की इज्ज़त और शोहरत भी खूब थी। इसमें पहला बट्टा तब लगा, जब फिल्मों का दौर आया। फिर तो मनोरंजन के पारंपरिक साधन पनाह मांगने लगे। पर तवायफ़ें ऐसा नहीं मानती थीं। सच तो यह है कि लखनऊ की तवायफ़ों को सबसे ज्यादा नुकसान समाज की मूर्खता से हुआ, जिसने पहले उनके कला-कौशल और हुनर की कम कदरी की। फिर सारी निगाहें उनके जिस्म पर गड़ा दीं और धीरे-धीरे हुस्न और इश्क की पुतलियों में बदलकर वेश्याओं की पांत में ला खड़ा किया।
भाईसाब, आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि सन 1857 के प्रसिद्ध सिपाही विद्रोह के दौरान लखनऊ में रहने वाली ‘अज़ीज़ुनबाई’ जैसी कई तवायफों ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम् भूमिका निभाई थी। उनकी कहानी इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलेगी, लेकिन कुछ अभिलेखीय रिपोर्टों और स्थानीय किंवदंतियों में उनकी भागीदारी का उल्लेख जरूर मिलता है। अज़ीज़ुनबाई ने कानपुर में एक मुखबिर, संदेशवाहक और संभवतः एक साजिशकर्ता के रूप में कार्य करके, विद्रोह का समर्थन किया। अज़ीज़ुनबाई मूल रूप से लखनऊ की रहने वाली थीं, लेकिन कम उम्र में ही कानपुर आ गईं। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित किए। ब्रिटिश जांच के साक्ष्यों के अनुसार अज़ीज़ुनबाई, सैनिकों के साथ अंतरंग होती थी, वह अक्सर पुरुष पोशाक पहने घोड़ों की सवारी करती थी और साथ में पिस्तौल भी रखती थी। हालांकि अज़ीज़ुनबाई की कहानी भी अन्य तवायफों की भांति भुला दी गई है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तवायफों का योगदान वाकई में सराहनीय था, किन्तु उनके सभी प्रयासों को व्यापक रूप से समर्थन नहीं मिला। गांधी जी ने स्वयं भी प्रचलित सामाजिक दृष्टिकोणों के कारण उनका समर्थन स्वीकार करने पर आपत्ति व्यक्त की।
भाईसाब, कालांतर में तवायफों को धीरे-धीरे अपमानजनक शब्द ‘वेश्या’ तक ही सीमित कर दिया गया, और उनकी व्यक्तित्व को समाप्त कर दिया गया। यह परिवर्तन नैतिक संहिताओं, कामुकता के नियमन और नस्लवाद से प्रेरित था। इसका परिणाम यह हुआ कि “वेश्या जाति” को एक मिथक के रूप में देखा जाने लगा। इस परिवर्तन ने सभी रखैलों, देवदासियों, नचनियों और तवायफों को अपनी चपेट में ले लिया। उन्हें ऐतिहासिक रूप से अपमानित, घ्रणित एवं समाज से सांस्कृतिक सम्पन्नता से सराबोर उनके मूल रूप को गायब ही कर दिया गया। तवायफों का नाश केवल एक सांस्कृतिक नुकसान नहीं था, बल्कि इसने उन लोगों का सम्मान भी छीन लिया, जिनके पास कभी यौन और आर्थिक स्वतंत्रता थी। 1980 के बाद से लखनऊ का मिजाज़ बदलने लगा था। नवाब, राजा, तालुकेदार, जमींदार ख़त्म होने लगे थे। नयी पीढ़ी के पास अनाब-शनाब पैसा भी नहीं बचा था। साथ ही मुजरा सुनने की जगह लोग फ़िल्मी गानों पर डांस पसंद करने लगे थे। फिर धीरे-धीरे नजाकत और नफ़ासत की जगह हुललड़ बाजों ने ले ली। उस समय की सरकारे तथाकथित स्वछता अभियान चलाने में भी लग गयी जिसकी वजह से कोठे और गलिया उजाड़ने लगी। 1980 के अंत तक लखनऊ की शान और उसकी अनूठी विरासत इतिहास की गोद में समा गयी थी। आज जो तवायफ़ें बची हैं, वे इज्ज़त और शोहरत दोनों से महरूम हैं।
भाईसाब…आशा करते हैं यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही अन्य खास विषय के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ…, धन्यवाद!

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