Home Teej Tyohhar आस्था का महापर्व : छठ | Chhath |

आस्था का महापर्व : छठ | Chhath |

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भाईसाब, क्या आपको पता है, 17 नवंबर से लोक आस्था का महापर्व छठ शुरू हो गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस त्योहार को सूर्य षष्ठी, छठ, छठी, छठ पर्व, डाला पूजा, प्रतिहार और डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व का समापन 20 नवंबर को होगा। यानी कि 4 दिनों तक चलने वाले छठ पूजा के पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उषा अर्घ्य देते हुए समापन होता है। तो भाईसाब, आज के इस लेख में हम आस्था का महापर्व छठ पर्व की महिमा और उसके महत्व के बारे में जानेंगे।
भाईसाब, आपको ये जानना बहुत जरूरी है कि छठ महापर्व सूर्य उपासना का सबसे बड़ा त्योहार होता है। इस पर्व में भगवान सूर्य के साथ छठी माई की पूजा-उपासना विधि-विधान के साथ की जाती है। यह सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। इस पर्व में आस्था रखने वाले लोग सालभर इसका इंतजार करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि छठ का व्रत संतान प्राप्ति की कामना, संतान की कुशलता, सुख-समृद्धि और उसकी दीर्घायु के लिए किया जाता है।
भाईसाब, आपके लिए ये जानना भी जरूरी है कि छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय, आज मनाया जा रहा है यानी नहाए-खाय से छठ महापर्व प्रारंभ हुआ है। भाईसाब, नहाय खाय जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट होता है – स्नान करके भोजन करना। इस दिन नहाय खाय के दिन व्रत करने वाली महिलाएं नदी या तालाब में स्नान करती हैं। इसके बाद कच्चे चावल का भात, चना दाल और कद्दू या लौकी का प्रसाद बनाकर उसे ग्रहण करती हैं। माना जाता है कि नहाय खाय का यह भोजन साधक में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि इस दिन व्रत करने वाले साधक इस सात्विक द्वारा खुद को पवित्र कर छठ पूजा के लिए तैयार होते हैं। नहाय खाय के दिन साफ-सफाई का विशेष महत्व होता है। इस दौरान कई नियमों का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है। ऐसे में इस दिन प्रसाद का भोजन बनाते समय स्वच्छा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व स्नान कर लें और हाथों की स्वच्छा का ध्यान रखें। भूलकर भी किसी जूठी चीज जैसे बर्तन का इस्तेमाल न करें। साथ ही इस दिन व्रती के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी सात्विक भोजन ही करना चाहिए।
भाईसाब, छठ पूजा का दूसरा दिन यानी कल 18 नवंबर को खरना अर्थात लोहंडा मनाया जाएगा। इस दिन का सूर्योदय सुबह 06 बजकर 46 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 05 बजकर 26 मिनट पर होगा। इसके अलावा तीसरे दिन यानी 19 नवंबर को संध्या अर्घ्य मनाया जाएगा, इस दिन छठ पर्व की मुख्य पूजा की जाती है। तीसरे दिन व्रती और उनके परिवार के लोग घाट पर आते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। छठ पूजा का चौथा दिन यानी 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा है व पारण किया जाएगा है। चौथा दिन छठ पर्व का अंतिम दिन होता है। इस दिन महाव्रत का पारण किया जाता है। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 47 मिनट पर होगा।
भाईसाब, छठ पूजा के दौरान सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा की जाती है। इस पूजा में भक्त गंगा नदी जैसे पवित्र जल में स्नान करते हैं। महिलाएं निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव और छठी माता के लिए प्रसाद तैयार करते हैं। महिलाएं इन दिनों एक कठिन निर्जला व्रत रखती हैं। साथ ही चौथे दिन महिलाएं पानी में खड़े होकर उगते सूरज को अर्घ्य देती हैं और फिर व्रत का पारण करती हैं। भाईसाब, ये भी जान लें कि छठ पर्व के दिनों में भूलकर भी मांसाहारी चीजों का सेवन न करें। साथ ही छठ पूजा के दिनों में लहसुन व प्याज का सेवन भी न करें। इस दौरान व्रत रख रही महिलाएं सूर्य देव को अर्घ्य दिए बिना किसी भी चीज का सेवन न करें। छठ पूजा का प्रसाद बेहद पवित्र होता है। इसे बनाते समय भूलकर भी इसे जूठा न करें। पूजा के लिए बांस से बने सूप और टोकरी का ही इस्तेमाल करना चाहिए। पूजा के दौरान कभी स्टील या शीशे के बर्तन प्रयोग न करें। साथ ही प्रसाद शुद्ध घी में ही बनाया जाना चाहिए। भाईसाब, पौराणिक कथाओं के मुताबिक छठी मैया भगवान सूर्य की बहन और ब्रम्हदेव की मानस पुत्री बताया गया है। कथाओं के अनुसार ब्रम्हदेव जब सृष्टि की रचना कर रहे थे तब उन्होंने खुद को दो हिस्सों में बांट दिया था। एक हिस्से को पुरूष तो दूसरे हिस्से को प्रकृति के रूप में बांट दिया था। इसके बाद प्रकृति को 6 हिस्सों में बांटा गया जिसमें छठा अंश छठी मैया का था। पौराणिक कथाओं में भगवान शिव और माता पार्वती के सुपुत्र कार्तिकेय को छठी मैया का पति बताया गया है।
भाईसाब, ये भी जान लें कि यह व्रत बहुत ही कठिन माना जाता है। इसमें 36 घंटों तक कठिन नियमों का पालन करते हुए इस व्रत को रख जाता है। छठ पूजा का व्रत रखने वाले लोग चौबीस घंटो से अधिक समय तक निर्जल उपवास रखते हैं। इस पर्व का मुख्य व्रत षष्ठी तिथि को रखा जाता है, लेकिन छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से हो जाती है, जिसका समापन सप्तमी तिथि को प्रातः सूर्योदय के समय अर्घ्य देने के बाद समाप्त होता है। यह व्रत महिलाएं अपनी संतान की अच्‍छी सेहत और दीर्घायु के लिए करती हैं। मान्‍यता है कि छठ पूजा में व्रत रखने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से छठी माता निसंतान दंपति की खाली झोली भर देती हैं।
तो भाईसाब, ये थी जानकारी आस्था का महापर्व छठ पूजा की, आशा करते हैं यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही अन्य रोचक जानकारी के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ, धन्यवाद!

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