Home Mahanubhav किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह | Chaudhary Charan Singh |

किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह | Chaudhary Charan Singh |

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– किसानों के वैचारिक-राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में वे हर मोर्चे पर सक्रिय रहे
– उनकी याद में हर साल किसान दिवस मनाया जाता है
– रमाला चीनी मिल की स्थापना कराकर किसानों के लिए तरक्की की नई राह खोली
– भूमि हदबंदी कानून उनके कार्यकाल की प्रमुख विशेषता है
– जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू कराकर सामंतशाही के खात्मा किया

किसानों के मसीहा कहे जाने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह किसानों की तकलीफों को वे अपनी तकलीफें समझते थे। उनका ऐसा मानना था कि ऐसे उद्योग सृजित होने चाहिए, जिनमें श्रम की मांग ज्यादा हो, जिससे अधिक लोगों को रोजगार मिल सके। वे रोजगार के पक्षधर रहे थे। किसानों के वैचारिक-राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में वे हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। किसान नेता के रूप में अपनी पहचान उन्हें खुश करती थी। वे इस बात पर काफी जोर देते थे कि उनका जन्म किसान के घर में हुआ। वे याद दिलाते कि उनका घर ऐसा था जिसकी दीवारें मिट्टी की और छत फूस की थी। उनकी याद में किसान दिवस मनाया जाता है। दिलचस्प है कि खेती उन्होंने कभी की नहीं। पर ये भी सच है कि वे जीवन भर खेती-किसानी से जुड़े सवालों को लेकर मुखर रहे। वह दो बार मुख्यमंत्री व देश के प्रधानमंत्री रहने के बावजूद सादगी की मूर्ति और आमजन के हितैषी थे। करोड़ों रुपये की संपत्ति के मालिक वर्तमान राजनीतिज्ञों के लिए मिसाल हैं। आज हम अपने इस लेख के जरिये, चौधरी चरण सिंह के जीवन और उनकी राजनितिक यात्रा और किसानों के लिए उनके द्वारा किये गये कार्यों से परिचय कराएंगे।

– चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को यूपी के हापुड़ में हुआ था। उन्होंने हमेशा ही किसानों के हित के लिए संघर्ष किया और कई महत्‍वपूर्ण फैसले लिए। उन्‍होंने जुलाई 1979 से जनवरी 1980 तक देश के पाँचवें प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यकाल के दौरान किसानों के उत्‍थान और विकास के लिए अनेक अहम नीतियां बनाईं। बाद में उनके यह प्रयास सफल भी हुए और किसानों के हालातों में काफी सुधार भी दिखा। उनकी कई योजनाओं को आज भी याद किया जाता है।
– रमाला चीनी मिल की स्थापना कराकर किसानों के लिए उन्होंने तरक्की की नई राह खोली थी।
– एक जुलाई 1952 को यूपी में उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला। उन्होंने लेखपाल के पद का सृजन भी किया। किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उप्र भूमि संरक्षण कानून को पारित किया। 3 अप्रैल 1967 को उप्र के मुख्यमंत्री बने।
– जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू कराकर सामंतशाही के खात्मा कराने व 27 हजार पटवारियों को बर्खास्तगी कर आंदोलन खत्म कराने जैसे उनके साहसिक फैसलों की आज भी गांवों में किसान तारीफ किए बिना अपने को नहीं रोक पाते।
– उन्होंने सहकारी खेती का विरोध, कृषि कर्ज माफी, कृषि को आयकर से बाहर रखने, किसानों को जोत बही दिलाने, नहर पटरी पर चलने पर जुर्माना वसूलने का ब्रिटिश कानून खत्म करने, कृषि उपज की अंतरराज्यीय आवाजाही पर रोक हटाने और कपड़ा मिलों को 20 प्रतिशत कपड़ा गरीबों लिए बनवाने जैसे शानदार काम किए।
– उन्होंने 13 हजार लेखपाल भर्ती किए जिसमें 18 फीसदी अनुसूचित जाति को हिस्सेदारी दी। पहले कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं था। शिक्षण संस्थाओं से जातियों के नाम हटवाने का काम किया।
– भारत के पांचवें प्रधानमंत्री चरणसिंह की व्यक्तिगत छवि एक ऐसे देहाती पुरुष की थी, जो सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखता था। भूमि हदबंदी कानून उनके कार्यकाल की प्रमुख विशेषता है
– चौधरी चरण सिंह किसान राजनीति के क्षीतिज पर लगभग पांच दशक तक छाए रहे। वह कृषि अर्थव्यवस्था की गहरी समझ रखने वाले उच्च कोटि के विद्धान, लेखक एवं अर्थशास्त्री थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता है।
– उन्होंने गाजियाबाद में वकालत शुरू की और 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और तीन बार कारावास झेला। उन्होंने सरकारी नौकरियों में कृषकों और कृषि मजदूरों के बच्चों के लिए 50 फीसदी आरक्षण की मांग की थी।
– आजादी के पूर्व उप्र में छत्रवाली विधानसभा सीट से चौधरी ने 9 वर्ष तक क्षेत्रीय जनता का प्रतिनिधित्व किया। देश की आजादी के बाद 1952, 1962 और 1967 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में पुन: चुने गए। डॉ। संपूर्णानंद के मुख्यमंत्रित्वकाल में 1952 में उन्हें राजस्व तथा कृषि विभाग का दायित्व सौंपा गया। 1960 में चंद्रभानु गुप्ता की सरकार में उन्हें गृह तथा कृषि मंत्रालय दिया गया। ये कांग्रेस और लोकदल के प्रमुख नेता थे।
– आपातकाल खत्म होने के बाद 1977 के आम चुनाव के बाद केंद्र में जनता पार्टी सत्ता में आई तो जयप्रकाश नारायण के सहयोग से मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे और चरणसिंह को देश का गृहमंत्री बनाया गया। बाद में मोरारजी और चरणसिंह के मतभेद खुलकर सामने आए तब चरणसिंह 28 जुलाई 1979 को समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री पद पाने में सफल हुए। प्रधानमंत्री बनने के बाद इन्होंने किसानों व आम जनता के हित में कई कदम उठाए। चरणसिंह 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।
– उन्होंने अपने 76वें जन्मदिन पर 23 दिसम्बर 1978 को उन्होंने दिल्ली के बोट क्लब पर ऐतिहासिक रैली की जिसमें किसानों का सैलाब उमड़ पड़ा था।
– गांव भूपगढ़ी में रहने के दौरान चरण सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया था। जिसके कारण 1941 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। जिला कारागार में उन्हें बैरक नंबर 9 में रखा गया था। आज इस जिला कारागार का नाम भी चौधरी चरण सिंह के नाम पर ही है।
– उनको बचपन से ही मिठाई खाने का शौक था। जब वह भूपगढ़ी में रहते थे तो जानी गांव में आकर मुन्नू हलवाई के पेड़ा खाते थे। बताते हैं दिल्ली में जब कोई गांव वाले उनसे मिलने आता था तो वह मुन्नूलाल हलवाई के पेड़े उनके लिए लेकर जाता था।
– उनका ध्येय वाक्य था कि भारत के समस्त किसान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों। उनके दिल में किसानों के प्रति काफी हमदर्दी थी। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं-अबॉलिशन ऑफ जमींदारी, भारत की भयावह आर्थिक स्थिति, इसके कारण और निदान,लीजेंड प्रोपराइटरशिप और इंडियास पॉवर्टी एंड इट्स सोल्यूशंस। वे हिन्दी, अंग्रेजी के साथ ही उर्दू के भी अच्छे जानकार थे।

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