Home Mahanubhav जनहित में की थी 4200 किमी की पदयात्रा : | PM: Chandra Shekhar |

जनहित में की थी 4200 किमी की पदयात्रा : | PM: Chandra Shekhar |

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युवा तुर्क के नाम से मशहूर रहे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर एक ऐसे राजनीतिक शख्सियत थे, जो बिना राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह किए, देशहित में काम किया करते थे। यारों के यार तो वे थे ही, अपने निजी सरोकारों के निभाने में भी उनका कोई जवाब नहीं था। वह ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने युवा साथियों के माध्यम से देश को समाजवादी दिशा में ले जाने का प्रयास किया। देश को उबारने के लिहाज से जयप्रकाश नारायण के साथ आकर खड़े हो गए। इसकी कीमत उन्हें जेल में नजरबंदी के रूप में चुकानी पड़ी। इसके बावजूद भी वे झुके नहीं बल्कि समाजवाद के प्रति उनकी धारणा और बढ़ गई।
आज हम अपने इस लेख के जरिये भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के जीवन और उनकी राजनितिक यात्रा से परिचय कराएंगे।

– देश को समाजवादी दिशा में ले जाने का प्रयास किया।
– राजनीति के प्रति रुझान विद्यार्थी जीवन में ही हो गया था।
– आपातकाल में आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार हुए।
– हमेशा शक्ति व पैसे की राजनीति को दरकिनार किया।
– सबको पीने का पानी, कुपोषण से मुक्ति से मुक्ति के लिए भारत यात्रा की।
– अपनी लेखनी में वह जनता को जगाने वाली शैली को अपनाते थे।
– उत्कृष्ट सांसद के पुरस्कार से सम्मानित।

चंद्रशेखर का जन्म 1 जुलाई, 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के ग्राम इब्राहीमपुर में हुआ था। इनका कृषक परिवार था। चंद्रशेखर का राजनीति के प्रति रुझान विद्यार्थी जीवन में ही हो गया था। इन्हें आग उग़लते क्रान्तिकारी विचारों के कारण जाना जाता था। चंद्रशेखर ने 1950-1951 में राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इनका विवाह दूजा देवी के साथ सम्पन्न हुआ था। इनके दो पुत्र पंकज और नीरज हैं। वे अपने देश से निःस्वार्थ भावना से जुड़े हुए थे। इनको अध्ययन में विशेष रूचि थी, स्वूल में वे एक मेधावी छात्र रहे। इलाहबाद यूनिवर्सिटी से अपना अध्ययन पूरा करने के बाद इन्होने राजनीति में प्रवेश किया। चन्द्रशेखर का विवाह श्रीमती दूजा देवी से हुआ एवं उनके दो पुत्र हैं – पंकज और नीरज।
1962 में वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। वे जनवरी 1965 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। 1967 में उन्हें कांग्रेस संसदीय दल का महासचिव चुना गया। संसद के सदस्य के रूप में उन्होंने दलितों के हित के लिए कार्य करना शुरू किया एवं समाज में तेजी से बदलाव लाने के लिए नीतियाँ निर्धारित करने पर जोर दिया। इस संदर्भ में जब उन्होंने समाज में उच्च वर्गों के गलत तरीके से बढ़ रहे एकाधिकार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई तो सत्ता पर आसीन लोगों के साथ उनके मतभेद हुए।
25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किये जाने के समय आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया जबकि उस समय वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष निकायों, केंद्रीय चुनाव समिति तथा कार्य समिति के सदस्य थे।
1975 में इमरजेंसी लागू हुई तो चंद्रशेखर उन कांग्रेसी नेताओं में से एक थे, जिन्हें विपक्षी दल के नेताओं के साथ जेल में ठूंस दिया गया। इमरजेंसी के बाद वे वापस आए और विपक्षी दलों की बनाई गई जनता पार्टी के अध्यक्ष बने। अपनी पार्टी की जब सरकार बनी तो चंद्रशेखर ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया। सत्ता के संघर्ष में कभी इस तो कभी उस प्रत्याशी का समर्थन करते रहे।
1984 से 1989 तक की संक्षिप्त अवधि को छोड़ कर 1962 से वे संसद के सदस्य रहे। 1989 में उन्होंने अपने गृह क्षेत्र बलिया और बिहार के महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा एवं दोनों ही चुनाव जीते। बाद में उन्होंने महाराजगंज की सीट छोड़ दी।
साल 1990 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला। जब उनकी ही पार्टी के विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बीजेपी के सपोर्ट वापस लेने के चलते अल्पमत में आ गई। चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल में टूट हुई। एक 64 सांसदों का धड़ा अलग हुआ और उसने सरकार बनाने का दावा ठोंक दिया। उस वक्त राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया।
हालांकि पीएम बनने के बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस के हिसाब से चलने से इंकार कर दिया। अपने कार्यकाल में उन्होंने डिफेन्स और होम अफेयर्स की जिम्मेदारियों को भी संभाला था।
सिर्फ 7 महीने देश के प्रधानमंत्री रहे थे चंद्रशेखर। तब चरण सिंह के बाद यह किसी पीएम का दूसरा सबसे छोटा कार्यकाल था। कांग्रेस के बाहरी समर्थन से उन्‍होंने जनता दल सरकार का नेतृत्‍व किया था। वह पहले ऐसे पीएम थे जिनके पास पूर्व में कोई सरकारी पद नहीं था। यानी वह सीधे प्रधानमंत्री बने थे।
चंद्रशेखर ने हमेशा शक्ति व पैसे की राजनीति को दरकिनार किया। सामाजिक बदलाव व लाेकतांत्रिक मूल्यों की राजनीति पर जोर दिया। वह ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने कांग्रेस का अभिन्न अंग रहते हुए भी युवा साथियों के माध्यम से देश को समाजवादी दिशा में ले जाने का प्रयास किया। जब उन्हें लगा कि कांग्रेस को कुछ निरंकुश ताकतें अपने हिसाब से चलाना चाहती हैं तो वे बिना वक्त गंवाए देश को उबारने के लिहाज से जयप्रकाश नारायण के साथ आकर खड़े हो गए। इसकी कीमत उन्हें जेल में नजरबंदी के रूप में चुकानी पड़ी। इसके बावजूद भी वे झुके नहीं बल्कि समाजवाद के प्रति उनकी धारणा और बढ़ गई।
1977 से आठ बार बलिया के सांसद रहे चंद्रशेखर 1984 में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बलिया में लोकसभा का चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
उन्होंने 6 जनवरी 1983 को कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक से भारत यात्रा शुरू की थी और करीब 4200 किमी की यह पदयात्रा 25 जून 1984 को दिल्ली के राजघाट पर समाप्त हुई थी। उसमें पांच बुनियादी मसले थे-सबको पीने का पानी, कुपोषण से मुक्ति, हर बच्चे को शिक्षा, स्वास्थ्य का अधिकार, सामाजिक समरसता लेकिन विडंबना देखिए इतनी महत्वपूर्ण यात्रा को सियासी पन्नों में दफना दिया गया।
चंद्रशेखर का जीवन दर्शन यह है कि वो पूरी तरह फियरलेस थे। चाहे अपनी बात को लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों से टकराने का मामला हो या फिर अपनी दोस्ती को लेकर, वो अटलबिहारी वाजपेयी को सार्वजनिक तौर पर गुरु कहते थे, हालांकि राजनीतिक दर्शन भिन्न होने के कारण आलोचना से परहेज भी नहीं करते थे। वो खुद मानते थे कि सार्वजनिक जीवन में आलोचना होनी चाहिए, लेकिन राजनीति के मायने उनके लिए विशेष थे। चंद्रशेखर ने अपने विचारों से देश में क्रांति लाने का प्रयास किया।
उन्होंने “यंग इंडिया ” नामक समाचार पत्र का सम्पादन किया, समाचार पत्रों में वह जनता को जगाने वाली शैली को अपनाते थे। वह बौद्धिक वर्ग में भी प्रिय रहे। वह बेखोफ और निष्पक्ष नेता थे।
1995 में चंद्रशेखर को उत्कृष्ट सांसद के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस पुरुस्कार की शुरुवात इसी वर्ष हुई थी, अतः चंद्रशेखर पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें ये सम्मान प्राप्त हुआ था।
चंद्रशेखर को बॉन मेरो कैंसर था, तबियत ख़राब के चलते उन्हें 3 मई 2007 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, 8 जुलाई 2007 को दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली, उस वक्त वे प्लाज्मा कैंसर से ग्रसित थे, उनकी उम्र 80 साल थी।

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