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किसान क्रेडिट कार्ड से घपलेबाज़ी का माजरा | Kisan Credit Card |

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किसान क्रेडिट कार्ड से घपलेबाज़ी का माजरा | Kisan Credit Card |

जानते है , किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से हो रहे फ़र्ज़ी वाड़े और कैसे यह भारतीय अर्थव्यवस्था को नुक्सान पहुंचा रहा है उसके बारे में ,
आजादी के बाद भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था कृषि पर केंद्रित थी और यही वजह है के ,भारत को एक कृषि प्रधान देश बोला जाता था। लेकिन कृषि प्रधान होने के बावजूद भारत ने अकाल के हालात कई बार झेले जिसको कम करने के लिए वर्ष 1960 के दौरान M.S. स्वामीनाथन के नेतृत्व में भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई जिसके बाद भारत अपनी जनसँख्या के लिए अनाज उत्पादन में काफी हद तक सफलता अर्जित कर ली थी। अब जब उत्पादन ज्यादा होने लगा तो डिमांड-सप्लाय की समस्या और कई अन्य फैक्टर जैसे की बिचौलिए, अनाज का स्टोरेज और जमींदारों द्वारा लार्ज लैंड होल्डिंग का सामना भारत के मध्यम वर्ग के किसानो को करना पड़ा। यह समस्या धीरे धीरे इतनी बड़ी होने लगी की किसान को अपनी लागत का उचित मूल्य भी मिलना मुश्किल होने लगा जिस से किसानो पर क़र्ज़ बढ़ने लगा और स्थिति यहाँ तक आ गयी की अब क़र्ज़ के बोझ से दबे किसान अब अपनी जान देने लगे। यह सिलसिला वर्ष 1970 से शुरू हुआ , वर्ष 1995 से लेकर वर्ष 2014 तक भारत में लगभग ३ लाख किसानो ने आत्महत्या की जिसमे महाराष्ट्र के किसान सबसे ज्यादा प्रभावित थे।

इन घटनाओ की शुरुवात होने के बाद , भारत सरकार ने मंथन करना शुरू किया और उस मंथन से यह निष्कर्ष निकला की B.sivaraman committee के विवेचना पर 12 जुलाई ,1982 को National Bank for Agriculture and Rural Development (NABARD) की स्थापना की गयी। इस बैंक का काम था किसानो को सस्ते इंट्रेस्ट रेट के माध्यम से सपोर्ट देना और बड़े बैंको के साथ कनेक्टिविटी स्थापित कर के रुट लेवल तक किसानो को मदद पहुंचना, नाबार्ड का दायरा जब धीरे धीरे देश में बढ़ने लगा तो इस बैंक ने अब किसानो के लघु उद्द्योगो को भी फाइनेंसियल सपोर्ट देना शुरू किया। जिसका सबसे बेहतर प्रभाव कॉटेज इंडस्ट्री पर देखने को मिला। इसके बाद बड़े बैंको के साथ मिल कर नाबार्ड ने ग्रामीण बैंको की स्थापना की , जो भारत के ग्रामीण किसानो के लिए सबसे प्रभावी कदम था। और जब वर्ष 1998 में किसान क्रेडिट कार्ड नाबार्ड की देख रेख में पब्लिक सेक्टर बैंको द्वारा शुरू किया गया तो इन ग्रामीण बैंको ने किसान क्रेडिट कार्ड के फायदों को ग्रामीण किसानो तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया ।
अगस्त ,1998 में किसान क्रेडिट कार्ड को शुरू किया गया जिसको R V गुप्ता समिति द्वारा विवेचना कर के नाबार्ड द्वारा लांच किया गया था। जिसमे किसान की जमीं को सिक्योरिटी मान कर 7% की ब्याज दर पर किसान को अगला फसल उगाने से पहले लोन के तौर पर दिया जाता है ताकि किसान को फसल उगाने के लिए जरुरी खाद्य और अन्य खर्चो को मैनेज करेने में मदद मिल सके और किसान को फाइनेंसियल बर्डन का सामना न करना पड़े, फसल उगने के बाद किसान अपने फसल को बेच कर यह लोन 6 महीने के भीतर चूका सकता है। जिस पर सरकार की तरफ से 3 प्रतिशत की ब्याज पर सब्सिडी भी मिलती है। मतलब किसान को केवल 4% ब्याज देना होता है। बैंक को, लेकिन एक शर्त यह है की फसल कटने के 6 महीनो के भीतर अगर यह धन चुकता नहीं किया जाता तो बैंक इस लोन को कमर्शियल लोन समझेगा और इस पर ब्याज दर कमर्शियल लोन की तरह 12,13 या 14 % तक भी लगा सकता है , जिस पर सरकार द्वारा कोई सब्सिडी योग्य नहीं होगा। तो किसान क्रेडिट कार्ड केवल कृषि कार्यों को करने हेतु किसानो को उनकी जमीं के आधार पर दिया जाने वाला एक सब्सीडीसेड लोन है।

वर्ष 2003 के लोकसभा चुनाव में एक शब्द का इस्तेमाल किया गया , जो था ‘क़र्ज़माफ़ी ‘ जिसके अंतर्गत किसानो द्वारा लिए गए कर्ज़ों को माफ़ करना , चुनावी मुद्दा बन गया था। जिसके बदौलत कांग्रेस सत्ता में आयी और उसके बाद से यह सिलसिला लगभग हर इलेक्शन में जारी रहता चला गया , चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का । वर्ष 2014 में NDA की गवर्नमेंट के आने बाद इस कर्जमाफी की जगह किसानो के खतों में 2000 रूपये हर 4 महीने पर देने का वादा किया गया जिसको NDA अपने दूसरे कार्यकाल तक निभा रही है।

ऐसेही महत्वपूर्ण जानकारी के लिए जुड़े रहिये भाईसाब के साथ।

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