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‘भारतीय जेलों पर बोझ’ | Burden on Indian Prisons

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Burden on Indian Prisons

भाईसाब, क्या आपको पता है, देश में बढ़ते अपराध के कारण भारतीय जेलों में कैदियों की जनसंख्या में दिन-पर-दिन बढ़ोतरी एक समस्या बनती जा रही है। देश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की समस्या लंबे समय से जस की तस है। जेलों में बंद लगभग 78 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं। इन पर अपराध साबित नहीं हुआ है।

देश के न्यायालयों में विचाराधीन कैदियों के लाखों मामले लंबित हैं। कुछ ऐसे मामले भी हैं जिनमें आरोपितों का लंबा समय जेल में गुजर रहा है, केवल इसलिए कि उन्हें अभियोग पक्ष, जो आमतौर पर स्वयं राज्य होता है, उसकी याचिका पर जमानत नहीं मिलती। भाईसाब, कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें आरोपित अपने पक्ष में वकील करने में सक्षम नहीं होता है या वह अपनी जमानती रकम का इंतजाम नहीं कर पाते, परिणामस्वरूप वह जेल में ही विचाराधीन कैदी बना रहता है। भाईसाब, अब सवाल यह उठता है कि ऐसे विचाराधीन कैदी जो लंबे समय से जेल में केवल कमजोर और लचर न्याय व्यवस्था के कारण बंद हैं, और अपराधी की तरह जीवन जीने का मजबूर हैं, इसकी जवाबदेही किसकी है? ऐसा तब है जब सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर जेलों में बढ़ती कैदियों की संख्या पर चिंता जताता रहा है। भाईसाब, अदालत ने यहां तक कहा है कि अंधाधुंध गिरफ्तारी से लेकर जमानत हासिल करने में आ रही मुश्किलों की वजह से विचाराधीन कैदियों को लंबे समय तक कैद में रखने की प्रक्रिया पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। आपको बता दें कि नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जेल में बंद 68 प्रतिशत विचाराधीन कैदी या तो अनपढ़ थे या उन्होंने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था। लगभग 73 प्रतिशत विचाराधीन कैदी दलित, जनजातीय तथा अन्य पिछड़ा वर्गों के थे, जबकि 20 प्रतिशत मुस्लिम थे। भाईसाब, सर्वाधिक विचाराधीन कैदी जिन राज्यों में हैं उनमें शीर्ष पांच में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, बिहार, पंजाब तथा ओडिशा हैं। इनके अलावा दूसरे राज्यों की जेलों में भी यही हाल है। भारत की जेलों में बंद केवल 22 प्रतिशत लोग ही सजायाफ्ता अपराधी हैं, जबकि लगभग 77 प्रतिशत बंदी विचाराधीन हैं। भाईसाब, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 में जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखने पर चिंता जताई गई है। मध्य प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जेलों में विचाराधीन बंदियों की संख्या 60 प्रतिशत से कम है। अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय और पुडुचेरी को छोड़ हर राज्य-केंद्र शासित प्रदेश में विचाराधीन कैदियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। भाईसाब, आपकी जानकारी के बताना जरूरी है कि 16 राज्यों एवं तीन केंद्र शासित प्रदेशों की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं। बिहार में जेलों की क्षमता से 140 प्रतिशत अधिक कैदी हैं जो वर्ष 2020 में 113 प्रतिशत थे। उत्तराखंड में कुल क्षमता की तुलना में 185 प्रतिशत अधिक कैदी हैं जो देश में सबसे ज्यादा हैं। 391 जेलों में क्षमता की तुलना में 150 प्रतिशत और 709 जेलों में 100 प्रतिशत अधिक कैदी हैं। वहीं, तमिलनाडु की कुल 139 जेलों में से 15 जेलें 100 प्रतिशत से अधिक कैदियों से भरी हैं। भाईसाब, छोटे राज्यों की बात करें तो मेघालय की पांच जेलों में से चार क्षमता से अधिक कैदियों से भरी हैं। हिमाचल प्रदेश की 24 जेलों में से 14 जेल 100 प्रतिशत से ज्यादा भरी हैं। स्पष्ट है कि इसकी वजह गिरफ्तारियों में वृद्धि और लचर न्यायिक प्रणाली है। इसलिए ऐसी स्थिति में जेल सुधार पर बात करना प्रासंगिक हो जाता है। भाईसाब, देश के कुल 1319 कारावास कैदियों की निर्धारित संख्या से अधिक से भरे पड़े हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि मामलों को जल्द निपटाकर देश की अदालतों के अलावा कारावासों का भी बोझ कम किया जाए। कैदियों को प्रभावी कानूनी सहायता प्रदान करना और व्यावसायिक कौशल एवं शिक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक कदम भी उठाए जाने चाहिए। अपराधियों को जेल भेजने के बजाय अदालतें उनकी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग कर जुर्माना और उन्हें चेतावनी के सकती हैं। प्रधानमंत्री ने भी इस संबंध में कई बार कहा है कि अधिकांश विचाराधीन कैदी जो गरीब अथवा सामान्य परिवारों से हैं, उन्हें जमानत पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

चलते-चलते भाईसाब, अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इस संबंध में 1800 से अधिक पुराने कानूनों की पहचान की है और 1450 से अधिक ऐसे कानूनों को रद कर दिया है जो अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। लोगों को जेल भेजने से रोकने के लिए कानून बनाने के अतिरिक्त यह भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस, अभियोग पक्ष की एजेंसियों के साथ-साथ न्यायपालिका की मानसिकता में भी बदलाव आना चाहिए। ऐसा होने पर जेल में बंदियों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है।

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