Home Haal-khayal ऑटिज्म से पीड़ित विद्यार्थियों के लिए सफल होने की रणनीतियां | Autism Challenges & Strategies

ऑटिज्म से पीड़ित विद्यार्थियों के लिए सफल होने की रणनीतियां | Autism Challenges & Strategies

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Success Strategy for Autistic Students

भाईसाब, क्या आपको पता है, अमेरिका के private स्कूलों में हर 100 students में से एक ऑटिज्म से पीड़ित है, लेकिन हां, इन students के group के पास maths, science, technology, Humanities और arts सहित व्यापक क्षेत्रों में शैक्षणिक प्रतिभा और कौशल भी हैं, इन छात्रों को अक्सर ‘दोहरे असाधारण’ कहा जाता है। इस आबादी के बारे में अधिक जानकारी लेने के लिए 3 समूहों पर शोध किया जिनमें ऑटिज्म से पीड़ित students, उनके parents और उनके साथ काम करने वाले कॉलेज के कर्मी। सभी students ने हाल में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। हुए थे, भाईसाब, आपको बता दें कि ऑटिज़्म से पीड़ित प्रतिभाशाली students में जबरदस्त क्षमता होती है लेकिन अक्सर उन्हें अपनी प्रतिभा विकसित करने का मौका नहीं मिलता है।

दोहरे असाधारण students की पहचान करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि उनकी प्रतिभा उनकी अक्षमता को छुपा सकती है, इसके विपरीत, उनकी अक्षमताएं उनकी प्रतिभा को छुपा सकती हैं, जब इन students की पहचान सिर्फ ऑटिज़्म के पीड़ित के रूप में की जाती है, तो उन्हें विशेष शिक्षा कार्यक्रमों में admission दिया जा सकता है जो छात्रों को अपनी क्षमता विकसित करने और आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय कमियों को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, उन्हें चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रमों में प्रवेश नहीं दिया जाता है। शोध के दौरान छात्रों को बताया गया कि उनकी शैक्षणिक सफलता और आत्मविश्वास दोनों के लिए कमियों की पहचान होना कितना महत्वपूर्ण है। भाईसाब, एक रणनीति के तहत ऐसे students का चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम में admission लेना जरूरी होता है ताकि वे अपनी क्षमका को और ज्यादा विकसित कर सकें, इसके अलावा ऐसे students में leadership Quality भी विकसित करना चाहिए, ऐसे कार्यक्रम ‘‘वास्तव में उनकी क्षमता में सुधार करते हैं, साथ ही खुद को और दूसरों को समझने में मददगार होते हैं । भाईसाब, सबसे जरूरी बात ऑटिज़्म के पीड़ित students के लिए एक सलाहकार, परामर्शदाता, शिक्षक का होना आवश्यक है, ऐसे पेशेवर छात्रों की प्रतिभा को पहचान सकते हैं, उनकी रुचियों में मदद कर सकते हैं और उनके विकास के अवसरों को बढ़ावा दे सकते हैं। भाईसाब, हाई स्कूल में ऐसे छात्रों को यह सिखाना अहम है कि वे अपनी मदद कैसे करें, आहार, व्यायाम, ध्यान, संगीत के माध्यम से उन्हें अपने भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना सिखाया जा सकता है, उन्हें ये भी सिखाया जाये कि उन्हें अपने अनुभवों का उपयोग समान रुचियों वाले मित्र बनाने के लिए करना चाहिए।

भाईसाब, आपको जानकारी के बताना जरूरी है कि ऑटिज्म disorder एक दिमागी बीमारी है, इसमें मरीज न तो अपनी बात ठीक से कह पाता है ना ही दूसरों की बात समझ पाता है और न उनसे संवाद स्थापित कर सकता है, यह एक developmental disability है, इसके लक्षण बचपन से ही नजर आ जाते हैं, यदि इन लक्षणों को समय रहते भांप लिया जाए, तो काबू पाया जा सकता है। भाईसाब, बच्चे हमारी भाषा तो नहीं समझते, लेकिन हाव भाव और इशारों को समझना शुरू कर देते हैं, जिन बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण होते हैं, उनका बर्ताव अलग होता है, वे इन हाव भाव को समझ नहीं पाते या इन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं, ऐसे बच्चे निष्क्रिय रहते हैं, बच्चा जब बोलने लायक होता है तो साफ नहीं बोल पाता है, उसे दर्द महसूस नहीं होगा, आंखों में रोशन पड़ेगी, कोई छुएगा या आवाज देगा तो वे प्रतिक्रिया नहीं देंगे, थोड़ा बड़ा होने पर ऑटिज्म के मरीज बच्चे अजीब हरकतें करते हैं जैसे पंजों पर चलना। भाईसाब, बता दें कि अधिकांश बच्चों में अनुवांशिक कारणों से यह बीमारी होती है, कहीं-कहीं पर्यावरण का असर इस बीमारी का कारण बनता है, डॉक्टरों के मुताबिक, इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, बच्चे को जीवनभर इस खामी के साथ जीना पड़ता है, हां, लक्षणों को जरूर कम किया जा सकता है, गर्भावस्था की जटिलताओं के कारण भी बच्चे इसका शिकार बनते हैं।

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चलते-चलते, भाईसाब, ये भी जान लें कि ऑटिज्म का इलाज आसान नहीं है, बच्चे की स्थिति और लक्षण देखते हुए डॉक्टर इलाज तय करता है, बिहेवियर थेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी से शुरुआती इलाज होता है, जरूरत पड़ने पर दवा दी जा सकती है, इन थेरेपी का यही उद्देश्य है कि बच्चे से उसकी भाषा में बात की जाए और उसके दिमाग को पूरी तरह जाग्रत किया जाए, ठीक तरह से इन थेरेपी पर काम किया जाए तो कुछ हद तक बच्चा ठीक हो जाता है।

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