Home Latest घातक हथियार निर्माण से अमेरिकी इकोनॉमी कनेक्शन | American Economy |

घातक हथियार निर्माण से अमेरिकी इकोनॉमी कनेक्शन | American Economy |

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भाईसाब, क्या आपको पता है, जब तक दुनिया में युद्ध होता रहेगा तब तक अमेरिका की अर्थव्यस्था फलती-फूलती रहेगी। एक रिसर्च के मुताबिक हथियारों के निर्यात के मामले में बीते पांच सालों में अमेरिका की वैश्विक भागीदारी 37 फीसदी से ज्यादा हो गई है। अमेरिका इस समय 96 देशों को हथियार सप्लाई कर रहा है और पांच सालों के दौरान उसका कुल विश्व प्रतिशत बढ़ा है। इससे साफ है कि अमेरिका का हथियार उद्योग कितना बड़ा है। भाईसाब, आपको बता दें कि अमेरिका एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही बन सका। प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर अब तक अमेरिका में जब-जब आर्थिक संकट गहराया है, तब-तब कोई न कोई युद्ध उसके लिए संकटमोचक की भूमिका निभाता रहा है। तो भाईसाब, आज के इस लेख में हम बढ़ती हुई अमेरिकी इकोनॉमी और हथियार निर्माण पर टिकी अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर चर्चा करेंगे…., हम ये बताने की कोशिस करेंगे कैसे युद्ध के भरोसे अमेरिका का आर्थिक दबदबा दुनिया में बढ़ता जा रहा है ?
भाईसाब,आपकी जानकारी के ये जानना जरूरी है कि पिछले 100 सालों से अमेरिका लगातार युद्ध में उलझा हुआ है। शायद ही कोई दशक ऐसा बीतता है जब अमेरिका किसी न किसी लड़ाई में शामिल नहीं रहता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के तुरंत बाद उसने कोरिया में जंग छेड़ दी। इसके बाद अमेरिका वियतनाम युद्ध में उलझ गया। वियतनाम युद्ध से निकलने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के अतिक्रमण के खिलाफ अप्रत्यक्ष लड़ाई को आगे बढ़ाया। सोवियत संघ का जब पतन हुआ तो सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला करके अमेरिका को एक और जंग का न्योता भेज दिया। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद वहां पैदा हुए बोस्निया संकटों में भी अमेरिका को अपनी सैनिक ताकत दिखाने का मौका मिला। इसके बाद अमेरिका के ऊपर 9/11 का आतंकवादी हमला हुआ। अमेरिका ने इस मौके का उपयोग सद्दाम हुसैन को खत्म करने के लिए और अफगानिस्तान पर तालिबान हुकूमत का सफाया करने के लिए किया। ये युद्ध विश्व में अमेरिका द्वारा केवल अपनी सैन्य ताकत की धौंस जमाने का काम नहीं है बल्कि अपनी आर्थिक शक्ति में जबरदस्त इजाफा करना भी है। भाईसाब, इस बात की पड़ताल करना जरूरी है कि इन युद्धों से अमेरिका को आर्थिक रूप से क्या लाभ और नुकसान हुए, क्योंकि कोई भी शासन केवल नुकसान उठाने के लिए लगातार युद्ध नहीं करता है। इसके पीछे आर्थिक मुनाफा छुपा रहता है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले अमेरिका एक कर्ज से दबा हुआ राष्ट्र था। युद्ध के बाद वह विशेष रूप से लैटिन अमेरिका के देशों के लिए ऋणदाता बन गया। इस दौरान अमेरिका से यूरोप के लिए निर्यात में वृद्धि हुई क्योंकि उन देशों ने युद्ध के लिए जरूरी सामान की खरीद अमेरिका से की। अमेरिका के पूंजीपतियों ने विशेष रूप से इस युद्ध में अच्छा लाभ कमाया। अमेरिका में हथियार निर्माण, जहाज निर्माण और वाहन उद्योग में अप्रत्याशित तेजी देखी गई। खासकर, हथियारों का निर्माण अमेरिका के लिए ज्यादा लाभदायक रहा क्योंकि दुनिया में जहां-जहां युद्ध होता वहां-वहां अमेरिका हथियारों की मदद के लिए पहुंच जाता और अपनी इकोनॉमी को मजबूत करता।
भाईसाब, अधिकतम घातक हथियारों का अनुसंधान, विकास और निर्माण अमेरिका अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हो गय है। दुनिया के देश उससे सैन्य सामग्री खरीदते रहें, इसके लिए वह हर प्रकार से प्रयत्नशील रहता है। उससे मदद हासिल करनेवाले राष्ट्रों को आर्थिक सहायता के अलावा हथियार खरीदी समझौता भी करना पड़ता है। अमेरिकी इकोनॉमी के सुचारु रूप से चलने के लिए जरूरी है कि विश्व में कहीं न कहीं युद्ध चलता रहे और वहां अमेरिकी हथियारों की खपत होती रहे। इसीलिए अमेरिका के आलोचक उसे युद्ध भड़कानेवाला या ‘वार माँगर’ कहते रहे हैं। अमेरिका में किसी भी पार्टी की सरकार आए, वह युद्धोन्माद का समर्थन करती है। शीत युद्ध के वर्षों में अमेरिका और तत्कालीन सोवियत यूनियन के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा थी। दोनों महाशक्तियों के बीच टकराव था। अमेरिका ने नाटो, सेन्टो, मीडो जैसी सैनिक संधिया बना रखी थीं और अपने समर्थक राष्ट्रों को हथियारों से लैस करता था। दूसरी ओर सोवियत यूनियन का वारसा पैक्ट था। अपने प्रभाववाले देशों को रूस हथियारों की आपूर्ति किया करता था। तब दोनों महाशक्तियों के बीच परमाणु शस्त्रों की होड़ जारी थी तथा एटमी परीक्षण कर वो अपनी शक्ति प्रदर्शन किया करते थे। भाईसाब, ये जान लें कि क्यूबा संकट के समय तो रूस और अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ केनेडी ने कदम पीछे हटा लिए अन्यथा भीषण युद्ध होने के आसार बन गए थे।
भाईसाब।।एक बात और जान लें कि अमेरिका की शस्त्र निर्माता कंपनियों का सरकार पर लगातार दबाव बना रहता है कि उनके शस्त्रों की बिक्री करवाई जाए। हथियार तभी बिकेंगे जब कहीं युद्ध हो या विभिन्न देश अपनी सुरक्षा के लिए खतरा महसूस करें। यह अमेरिका ही है जिसने पाकिस्तान को सिर से पैर तक हथियारों से लाद दिया था। जब-जब पाकिस्तान को घातक शस्त्र मिले, उसने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ा। 1965 व 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान अमेरिकी सैबर जेट और पैटन टैंकों के भरोसे लड़ा था। भारत ने उसका मुकाबला नैट, अजीत कैनबरा और मिग-19 विमानों से किया था। इस तरह के युद्ध से अमेरिका अपनी सैन्य सामग्री की संहारक क्षमता का परीक्षण भी कर लेता है।
भाईसाब, अमेरिका स्वयं भी ‘मानव की गरिमा’ के नाम पर ऐसे युद्ध में कूद पड़ता है जो उसकी सीमा से हजारों मील दूर हैं। 1950 का कोरिया युद्ध, 1964-65 का वियतनाम युद्ध इसकी मिसाल है। ऐसे ही इराक पर घातक बायोलाजिकल वेमन रखने का मनमाना आरोप लगाकर सद्दाम हुसैन का सफाया किया गया। वहां अमेरिका ने कारपेट बाम्बिंग की थी। अफगानिस्तान में रूसी फौजों से लड़ने के लिए अमेरिकी धन व शस्त्रों तथा पाकिस्तान की ट्रेनिंग से मुजाहिदीन तैयार किए गए थे। दक्षिण अमेरिकी देशों या अफ्रीकी देशों की आपसी लड़ाई में भी अमेरिकी शस्त्रों की खपत होती आई है।
भाईसाब, है न कमाल, वर्तमान में भी अमेरिका गाजा युद्ध से मालामाल हो रहा है। इजराइल ने हमास, हिजबुल्लाह, हूली जैसे आतंकी संगठनों से निपटने के लिए व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया है। अमेरिका ने अपनी संसद से 106 अरब डॉलर के इमरजेंसी डिफेंस पैकेज को मंजूरी देने की मांग की है। ये हथियार इजराइल, यूक्रेन और ताइवान को दिए जानेवाले है। अमेरिका ने पूरे पश्चिम एशिया को 40,000 से ज्यादा महाविनाशक हथियार भेजे हैं। युद्ध में हजारों लोग मरते हैं तो मरे लेकिन अमेरिका की हथियार निर्माण कंपनियों को काम मिलेगा और भारी मुनाफा होता रहेगा।
तो भाईसाब, हमने बढ़ती हुई अमेरिकी इकोनॉमी के पीछे का रहस्य उजागर कर दिया है। आशा करते हैं यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी, ऐसी ही अन्य खास विषय के लिए जुड़े रहें भाईसाब के साथ, धन्यवाद!

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