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आगरा का महशूर पेठा ।

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आगरा के ताजमहल के साथ ही यहाँ का पेठा भी बहोत मशहूर है | पेठा और ताजमहल दोनों एक दूसरे जुड़े हुए हैं। कहते हैं कि पेठा ताजमहल से भी पुराना है। इतिहासकारों के अनुसार, 17वीं शताब्दी में जब शाहजहां ताजमहल का निर्माण कर रहे थे, तब उसके निर्माण में लगे कारीगर रोज़ाना एक जैसा खाना खाकर उकता गए थे। साल 1632 में ताज महल का निर्माण शुरू हुआ था उस समय भीषण गर्मी में करीब 20 हजार मजदूर पत्थरों के बीच में काम करके बुरी तरह थक जाते थे। तब इससे निजात पाने के लिए पेठे की मदद ली गई थी। गर्मी में मजदूरों के लिए सस्ता और तुरंत एनर्जी देने की वजह से पेठा आगरा की शान बन गया। ताज महल का निर्माण साल 1653 में खत्म हो गया। तब पेठे के कारीगरों ने इसे अपना बिजनेस बना लिया और उसके बाद से ही पेठे की मिठास पूरे देश में फैल गई और इसे पूरे देश में बनाया और बेचा जाने लगा। कहा जाता है के ,शाहजहां की बेग़म मुमताज को पेठा बहुत पसंद था। खुद मुमताज ने उन्हें अपने हाथों से पेठा बनाकर खिलाया था। मुगल बादशाह को पेठे की मिठाई बहुत पसंद आई और उन्होंने अपनी शाही रसोई में इसे बनाने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद खुद शाहजहां 500 कारीगरों के माध्यम से अपनी रसोई में पेठा बनवाने लगे।भले ही इस कहानी का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं हो पर आगरा के पेठे कारीगरों की मानें तो यह कहानी उनके लिए किसी इतिहास से कम भी नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह कहानियां उनके परिवार में सुनी और सुनाई जाती हैं।
बाजार में अलग अलग स्वाद के पेठों की बिक्री होती है जैसे अंगूरी, इलायची, चॉकलेट, गुलाब लड्डू, डोडा बर्फी, पान, केसर आदि। सभी पेठों को बनाने की अलग विधि होती है।
पेठा तैयार करने की प्रक्रिया ,
पेठा कुम्हड़ा नाम के फल से बनता है। इसे आम बोलचाल की भाषा में कच्चा पेठा कहते हैं। इस पेठे को आगरा के ग्रामीण इलाकों और औरेया में उगाया जाता है। सादा पेठा बनाने में करीब 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम की लागत आती है। पेठा बनाने के लिए इस फल को चार टुकड़ों में काटकर बीच का हिस्सा निकाल दिया जाता है। बाकि बचे हिस्से को नुकीले औजार से गूंदा जाता है।इसके बाद सांचों की मदद से तरह-तरह के आकार दिए जाते हैं। फिर चूने के पानी में करीब एक घंटे तक रखा जाता है, तब इसे उबाला जाता है। उबलते पानी में थोड़ी फिटकरी डाली जाती है, ताकि चूने का अंश न रह जाए। बाद में इसे चीनी की चाशनी में घोलकर फिर से उबाल लिया जाता है। सूखा पेठा बनाने के लिए इसे सुखा लिया जाता है और गीला बनाने के लिए चाशनी को रहने दिया जाता है।
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